ब्रह्मचारी को चाहिए धर्मी

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ब्रह्मचारी को चाहिए धर्मी


ब्रह्मचारी को चाहिए धर्मी,
तन पर उबटन लावे ना।
आंखों में ना काजल लावे,
जूता पहन के जावे ना।
काम,क्रोध,मद,लोभ छोड़ दे,
छाता कभी लगावे ना।
नाच रंग में कभी न जावे,
गंदे गाने गावे ना।

झूठा जो अभियान त्याग कर,
वृद्ध जनों का मान करे।
धन से भरे कोष को पाकर,
दीन दुखी का ध्यान करे।
चलाकी,मक्कारी,तजकर,
धर्म का नित्य बखान करे।
“धर्मवीर”एैसे जन का जग,
आठ पहर गुणगान करे।


जिस घर में ना दूध मथन के,
शब्द सुनाई आते हैं।
जिस घर में ना छोटे-छोटे,
बाल खेलते पाते हैं।
जिस घर में ना गुरुजनों
के,
गुण गौरव को गाते हैं।
ऐसे घर को “धर्मी” जन
सब, वन के तुल्य बताते हैं।