स्वस्ति स्वस्ति पथिकृत के

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स्वस्ति स्वस्ति पथिकृत के

स्वस्ति स्वस्ति पथिकृत के
ले चल हमको सत्यपथ पे
दूर कर दे अघ-तम को
हे गुरु !
आके सन्सार में
भूले-भटके मार्ग में
जाएँ तो कहाँ जाएँ
तुम कहो!
सर पटक के पटक के
खाए क्यों ग़म
सही मार्ग कहो पूछें
किससे हम
क्यों ना अभी से
तू करता कृपा
स्वस्ति स्वस्ति पथिकृत के
ले चल हमको सत्यपथ पे
दूर कर दे अघ-तम को
हे गुरु !

कोई कहीं ना होवे वैरी
प्रीत से प्रीत मिले गहरी
कल्याण शरण में ले लो दयाल
बन जाओ मेरे हृदय-प्रहरी
धन धान्य सन्तान में हो आनन्द
हे पुष्टि दाता! कृपा हो तेरी
अर्पित है तुझको कराया और किया
हे सखा!
स्वस्ति स्वस्ति पथिकृत के
ले चल हमको सत्यपथ पे
दूर कर दे अघ-तम को
हे गुरु !

सबसे यथा योग्य धर्मानुसार
प्रीत से ओतप्रोत करूँ व्यवहार
द्वेष से ना रखूँ कोई सरोकार
द्वेष रूपी डाकू भीतर से मार
प्रीत रूपी धन दे दे इतना करतार
लेकर विश्वामित्र से बाँटूँ अपार
‘सर्व आशा मम मित्रं भवन्तु’ तू करा
स्वस्ति स्वस्ति पथिकृत के
ले चल हमको सत्यपथ पे
दूर कर दे अघ-तम को
हे गुरु !
आके सन्सार में
भूले-भटके मार्ग में
जाएँ तो कहाँ जाएँ
तुम कहो!
सर पटक के पटक के
खाए क्यों ग़म
सही मार्ग कहो पूछें
किससे हम
क्यों ना अभी से
तू करता कृपा
स्वस्ति स्वस्ति पथिकृत के
ले चल हमको सत्यपथ पे
दूर कर दे अघ-तम को
हे गुरु !