आत्मा है अजर अमर
आत्मा है अजर अमर
इसे शस्त्र ना काट सकें
ना अग्नि दग्ध कर सके
ना जल गला सकें
आत्मा है अजर अमर
इसे शस्त्र ना काट सकें
ईश्वर समर्पित कर्म हैं
निष्काम जो हैं पुण्य
जो फल की इच्छा ना करे
ईश्वर करे उसे धन्य
पुरुषार्थ करे दान करे
तप करे अनन्य
करते हैं वर्षा मोक्ष की
परमेश्वर के पर्जन्य
आत्मा है अजर अमर
इसे शस्त्र ना काट सकें
पातक महापातक कर्म ही
कहलाते हैं पाप
हिंसा वचन परपीड़न
मार काट घात
पशु-पक्षी जलचर कीट आदि
योनि का मिले श्राप
आत्मा है अजर अमर
इसे शस्त्र ना काट सकें
मिश्रित कर्मों की योनि में
मिलता है मानुष तन
भोग कर्म सुख व दु:ख का
मिलता है मिश्रित धन
यह सोच ले क्या पाना तुझे
वैसा ही कर प्रण
क्यों ना पाए हम पुण्य से
मधु मोक्ष का आनन्द
आत्मा है अजर अमर
इसे शस्त्र ना काट सकें
ना अग्नि दग्ध कर सके
ना जल गला सकें
आत्मा है अजर अमर
इसे शस्त्र ना काट सकें










