मैं तो इक नन्ही चिड़िया हूँ

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मैं तो इक नन्ही चिड़िया हूँ

मैं तो इक नन्ही चिड़िया हूँ,
अभी आसमान को पाना है।
यह पंख भी अब तक खुले नही’
ऐसे कैसे मर जाना है?

हाँ हाँ मैं हूँ सुन्दर बेटी,
हर बच्चे सुन्दर होते है।
इक बच्ची की सुन्दरता पर,
क्या ऐसे मोहित होते है?

इतनी पीड़ा मुझ नन्ही को,
कैसे बर्दाश्त करूँगी मैं?
तीखी मिर्ची ना सह पाऊं,
यह दर्द कहाँ से सहूंगी मैं?

अफसोस है ऊपर वाले से,
क्यों नारी रूप दिए मुझको?
इन आदमखोर दरिंदो में,
क्यों ऐसे सौंप दिए मुझको?

धिक्कार है ऐसे मानव पर,
जो तनिक भी ना घबराते है।
मासूम कली पर हवस मिटाकर,
खुद को मर्द बताते है..।

पर एक एहसान रहेगा की,
दुनिया से मुझे मिटा डाला।
जिसने मेरा निर्माण किया,
उनसे फिर भेंट करा डाला।

अब जाकर उनसे पूछूँगी,
किस मार्ग गया भगवान भटक?
इक बच्ची पर पौरुष दिखलाते,
यही है तेरे सृष्टि घटक?

मुझ गुड़िया सी नाजुक को यूँ,
क्यों जन्म से नही किया सक्षम।
बतलाती इन हैवानो को,
क्या होती है गलती अक्षम।

कलयुग की नारी भीम बन,
कर छाती चीर दुशासन का।
ले लहू हाथ में राक्षस के,
कम करती बोझ प्रशासन का।

अरे रावण भी मर्यादित था,
था नारी का सम्मान उसे,
अब और घ्रणित उपमा क्या है,
जिनका मैं दूँ पहचान उसे।

ओ भारत के न्यायिक करता,
पहले अब न्याय की बारी है।
कब नेत्र उदय होंगे अपने,
हर बेटी हमको प्यारी है।

अब नही चाहिए किसी निर्भया,
के लहू के रंजित अवशेष।
दो न्याय मगर हर बेटी को,
अब उबल रहा है पूरा देश।

हर घर की बहनों का अब तो,
लहू का हमको लेना प्रतिशोध।
जब तक कलम ना हो गर्दन,
अब नही मिटेगा मन से क्रोध।

इन राक्षस वध उपरान्त ही सब,
ईश्वर को तिलांजलि देंगे।
कर नमन बेटियों को नम दिल,
एक सच्ची श्रद्धांजलि देंगे!!