धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को

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धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को

धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को

धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को

मन मोड़ा फिर डर नहीं
कोई दूर प्रभु का घर नहीं
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को

मन लोभी, मन कपटी, मन है चोर
कहते आए यहाँ पल पल में और
कुछ जान ले कुछ मान ले
हो ना है विचलित नहीं
कोई दूर प्रभु का घर नहीं
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को

जप तप तीर्थ – सब होते बेकार
जब तक मन में रहते भरे विकार
बेईमान क्यों, नादान क्यों
गफलत ऐसे कर नहीं
कोई दूर प्रभु का घर नहीं
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को

जीत लिया मन फिर ईश्वर नहीं दूर
जान बूझ कर इंसाँ क्यूँ मजबूर
अभ्यास से, वैराग्य से
कुछ भी है दुष्कर नहीं
कोई दूर प्रभु का घर नहीं
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को

मन मोड़ा फिर डर नहीं
कोई दूर प्रभु का घर नहीं
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को
धीरे धीरे मोड़ तू इस मन को
इस मन को तू
इस मन को