चोर चोर तो सब कहते हैं पर

0
63

चोर चोर तो सब कहते हैं पर

चोर चोर तो सब कहते हैं पर
कुछ ही करते गौर
सबके मन के भीतर छुप के
बैठे हैं कई चोर

पहला चोर है काम वासना
जो मन को भरमाये
दूजे चोर का नाम क्रोध है
सब के होश उड़ाये
इन चोरों के हाथों में हैं
हर इक पाप की डोर
चोर चोर तो सब कहते हैं पर
कुछ ही करते गौर
सबके मन के भीतर छुप के
बैठे हैं कई चोर

तीजा चोर ये मद है जिसको
अपने वश में कर ले
नयन के होते अन्धा कर दे
उसकी बुद्धि हर ले
मद में उसको देता दिखाई
ना रैना ना भोर
चोर चोर तो सब कहते हैं पर
कुछ ही करते गौर
सबके मन के भीतर छुप के
बैठे हैं कई चोर

लोभ वो चोर है जिसकी
जितनी आयु बढ़ती जाये
मोह के चोर के सङ्ग ये मिल के
ऐसा जाल बिछाये
जिसमें घिर कर मिले किसी को
कोई ओर न छोर
चोर चोर तो सब कहते हैं पर
कुछ ही करते गौर
सबके मन के भीतर छुप के
बैठे हैं कई चोर

चोर चोर तो सब कहते हैं पर
कुछ ही करते गौर
सबके मन के भीतर छुप के
बैठे हैं कई चोर