ना पाऊँ दीनता प्रभुजी !!

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ना पाऊँ दीनता प्रभुजी !!

ना पाऊँ दीनता प्रभुजी !!
मेरा सौभाग्य नित जागे
ना माँगे पुत्र, क्या अपने पिता से
किससे फिर माँगे ?
ना पाऊँ दीनता प्रभुजी !!
मेरा सौभाग्य नित जागे

धरूँ जब धर्म तो प्रभुजी !!
सदा मैं माँगूँ तुमसे अर्थ
मिले जो अर्थ तुमसे
ना कभी जाने दो यूँ ही व्यर्थ
उसे बाँटूँ में परिवारों-समाजों
में विनयता से
ना पाऊँ दीनता प्रभुजी
मेरा सौभाग्य नित जागे

सभी जो कार्य हैं जग के
है उसमें सबका ही सहयोग
तो क्योंकि हम अकेले ही
करें धन-माल का उपभोग
जो मिलकर बाँट कर भोगें
तभी तो यज्ञ को साधें !
ना पाऊँ दीनता प्रभुजी
मेरा सौभाग्य नित जागे

मिले जो धन ना आ जाए बुराई
छलित छ: रिपुओं की
ये मद, मोह, काम, क्रोध, लोभ,
मत्सर दोष दूरितों की
करें आत्मनिरीक्षण तो
ये बाह्य-शत्रु ना जागें
ना पाऊँ दीनता प्रभुजी
मेरा सौभाग्य नित जागे

बने हम स्वावलम्बी और
सहनशील ही समता से
परिश्रम हम स्वयं कर लें
ना आश्रित होवें जनता पे
यह लक्ष्मी होती है चंचला
संयत जीवन बढ़े आगे
ना पाऊँ दीनता प्रभुजी
मेरा सौभाग्य नित जागे

ना अर्जित धन में हो अन्याय
ना धोखा-धड़ी छल-छिद्र
ये धन चिरस्थाई होगा तब
कमाई होगी जब भी पवित्र
हे इन्द्र! इष्टि करो पूरण
ललित धन-धान्य हम माँगे
ना पाऊँ दीनता प्रभुजी
मेरा सौभाग्य नित जागे
ना माँगे पुत्र, क्या अपने पिता से
किससे फिर माँगे ?
ना पाऊँ दीनता प्रभुजी !!
मेरा सौभाग्य नित जागे