हो रही है प्रतीति, मुझे आज विशेष बल की
हो रही है प्रतीति
मुझे आज विशेष बल की
रसमयी है अद्भुत शक्ति
कल तक तो मैं अशक्त था
मिली है अपूर्व अब शक्ति
अब शक्ति
हो रही है प्रतीति
मुझे आज विशेष बल की
अमर वस्तु है अध्वर
जिसके कारण बना जहान भी
अमृत यज्ञ नहीं मरता है
मरता नहीं यजमान भी
कितनी विशाल यह आग है जो
हर पल रहती है जलती
रहे जलती
हो रही है प्रतीति
मुझे आज विशेष बल की
प्रेरणा शक्ति इसमें
उज्जवलता कितनी अतिरेक
कितना प्रभावशाली
इस विश्व-याग सन्देश
तुझे नमन तेरे बल को नमन
ये ज्योति रहे मुझे फलती
मुझे फलती
हो रही है प्रतीति
मुझे आज विशेष बल की
अपनी शक्ति दी है मगर
डर मुझको अब हे शक्तिधर!
लँगड़े की लाठी जो बने हो
बने रहो हे प्रीतिकर!
आँख से ओझल रहो कभी ना
चाहे घड़ियाँ रहें बदलती
बदलती
हो रही है प्रतीति
मुझे आज विशेष बल की
मेरे यज्ञ को चलित ही रखना
चाहे जियूं चाहे मर जाऊँ
‘चेतिष्ठ’ दे दी चेतना
अब सहारा तेरा पा जाऊँ
मैं शक्तिरस की हूँ सन्तति
तुझ पर हूँ मैं अवलम्बी
अवलम्बी
हो रही है प्रतीति
मुझे आज विशेष बल की
हो रही है प्रतीति
मुझे आज विशेष बल की
रसमयी है अद्भुत शक्ति
कल तक तो मैं अशक्त था
मिली है अपूर्व अब शक्ति
अब शक्ति
हो रही है प्रतीति
मुझे आज विशेष बल की
हो रही है प्रतीति
मुझे आज विशेष बल की










