हे आत्मा ! अमृत से झरे हो
हे आत्मा ! अमृत से झरे हो
शिव-सुन्दरता-सत्य से भरे हो
हे आत्मा ! अमृत से झरे हो
जड़वत् देह में शक्ति कहाँ है?
तुम जहाँ शक्ति वहाँ है
तेरे बिना निष्प्राण है देह
इस घट में तू जवाँ है
तेरे कारण चेतनता है
इन्द्रिय-देह की नाव खेता है
सुन्दर अवयव की सन्निवेष हो
हे आत्मा ! अमृत से झरे हो
सुषुप्ति अवस्था में जागृत शक्तियाँ
लेते हो केवल समेट
जागृत में रश्मियाँ लौटाते
इन्द्रियाँ होती सचेत
जब तुम देह को त्याग देते हो
मिट्टी के ढेर सा रूप हो जाता
तुम ही देह का साथ देते हो
हे आत्मा ! अमृत से झरे हो
इस माटी के बर्तन में तुम
अमृत हो के भरे हो
इस कारण देह शव ना रहता
तुम जी-जान बने हो
कितनी अदभुत शुद्धता तेरी
लेके पवित्रता देह से जुड़े हो
संकल्प-विकल्प के साक्षी रहे हो
हे आत्मा ! अमृत से झरे हो
स्पष्ट देख रहे मुर्दा शरीर में
चेतनता तुम लाते
और अरूपों का रूप निखारते
ज्ञान कर्म-शक्ति जगाते
प्यारे इन्द्र से देह हुआ धन्य
चेतनता-सौन्दर्य तुम्हीं हो
जागृत शक्ति के अनूप अमी हो
हे आत्मा ! अमृत से झरे हो
शिव-सुन्दरता-सत्य से भरे हो
हे आत्मा ! अमृत से झरे हो










