जगदीश ज्ञानदाता, सुखमूल शोकहारी
जगदीश ज्ञानदाता,
सुखमूल शोकहारी
भगवन् तुम्हीं सदा हो
निष्पक्ष न्यायकारी
सब काल सर्वज्ञाता
सविता पिता विधाता,
सबमें रमे हुए हो तुम
विश्व के विहारी
कर दो बलिष्ठ आत्मा,
घबराएँ न दुखों से,
कठिनाइयों का जिससे,
तर जाएँ सिन्धु भारी
निश्चित दया करोगे,
हम माँगते यही हैं,
हमको मिले स्वयं ही,
उठने की शक्ति सारी
उठ भोर भई त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की वेला है
प्रभु परमेश्वर में ध्यान लगा
जो सच्चा सखा सहेला है
उठ भोर भई त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की वेला है
शुद्ध शीतल सुन्दर सुगन्ध भरी
वायु चलती आनन्द भरी
देखो उषा ने गगन-मण्डल पर
डाला खूब उजेला है
उठ भोर भई त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की वेला है
पशु जागे, पक्षी चेते हैं
गुणगान करें – जगदीश्वर का
तू भी उठ जाग – प्रभु गुण गा
बना आलस का क्यों चेला है
उठ भोर भई त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की वेला है
मानव का चोला है तेरा,
ईश्वर भक्ति से सफल बना
प्रभु-भक्ति बिन यह चोला भी
इक माटी का ही ढेला है
उठ भोर भई त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की वेला है
धन, जन, बल, तन ना साथ चले
शुभ कर्म कमा इस चोले से
आया था अकेला दुनिया में
जाना भी तुझे अकेला है
उठ भोर भई त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की वेला है
ए बन्दे सोच, विचार जरा,
मोह-माया में क्यों फँसा रहा
यह बात सदा रख सम्मुख तू
यहाँ चार दिनों का मेला है
उठ भोर भई त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की वेला है
“सेवक” ऋषियों के सत्संग से
तू आत्मा अपनी शुद्ध बना
जप-तप से जीवन को चमका
और झूठा छोड़ झमेला है
उठ भोर भई त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की वेला है
प्रभु परमेश्वर में ध्यान लगा
जो सच्चा सखा सहेला है
उठ भोर भई त्यागो निद्रा
अब ईश भजन की वेला है










