आत्मा को दर्शन की चाह, सोमामृतमय पान करें
आत्मा को दर्शन की चाह,
सोमामृतमय पान करें
ज्ञानमय भक्तिभावों को,
आत्मा में हम ग्रहण करें
मैं तुम्हारी महिमा जानूँ
ऊँचे-लोक ले जाते तुम
है जहाँ ज्योति ही ज्योति
आनन्द-धाम जिसे कहें
जहाँ प्रकाश अमिट पवित्रतम,
अविनश्वर ज्योतिपुञ्ज
क्षरित होने वाले सोम,
अमर ज्योति का वर मिले
है अक्षीण यह अमृत लोक,
मृत्यु का ना जहाँ प्रवेश,
इतना तो कर सकते हो इन्दो !
एक बूँद अमृत की दे
आत्मा को दर्शन की चाह,
सोमामृतमय पान करें
ज्ञानमय भक्तिभावों को,
आत्मा में हम ग्रहण करें










