भूलजा व्यर्थ ईर्ष्या-द्वेष को

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भूलजा व्यर्थ ईर्ष्या-द्वेष को,

भूलजा व्यर्थ ईर्ष्या-द्वेष को,
छोड़ दे मन में उठे क्लेश को,
पहचान अपने सही वेष को
मान ऋषिओं के संदेश को
तो आनन्द आएगा…

महसूस कर प्राकृति की महक तू,
भूलकर दुर्भावना, पक्षीसा चहक तू
देख दूसरो के सुख, मत बहक तू
बंद करके आँखें, खोल धीरे से ज़रा,
तो आनन्द आएगा…

तोड़ दे व्यर्थ सारे बन्धनों को,
अलविदा कह दे महफिलों को,
ज़रा पंख फैला, उड़ के दिखा,
स्वयं को सच्चे ईश्वर से मिला
तो आनन्द आएगा…

बनके खुद पाप का पुतला,
पाप दूसरों में ढूँढता फिरा,
क्या कभी किसी को मिला,
बदल के देख नज़रिया
अपना ले मानवता
तो आनन्द आएगा…

भूल जा दूरियाँ,
अपना ले खामोशियाँ,
जी ले जीवन ये तेरा,
राम कृष्ण की तरह
चख़ ले बेर भिलनी के,
साथ माखन मिश्रियाँ
तो आनन्द आएगा…

ईश् हृदय के आँगन में बिठा,
मन की मधुर वीणा तू बजा,
बहन अंजलि की तरह,
भजन गुनगना ले तू जरा,
पवित्र कर ले ये जिव्हा
तो आनन्द आएगा…

सीख प्रेम कृष्ण से,
मर्यादा राम की अपना,
भीतर ओ३म् को बसा,
सुरेश कहता है सदा
भाग्य संवर जाएगा
तो आनन्द आएगा…

ओ३म् हर वक्त गुनगुना,
मन का शंख तो बजा,
भीतर ज्योत भक्ति की जला,
आँख मूंद, मन से ईश्वर बुला,
तो आनन्द आएगा !!