क्रोध न छोड़ा, झूठ न छोड़ा

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क्रोध न छोड़ा, झूठ न छोड़ा

क्रोध न छोड़ा, झूठ न छोड़ा,
“सत्य वचन”(3) क्यों छोड दिया
नाम जपन क्यों छोड़ दिया . . .

“झूठे जग”(4) में दिल ललचा कर,
“असल वतन”(5) क्यों छोड दिया
नाम जपन क्यों छोड़ दिया . . .

कौड़ी को तो खूब सम्भाला,
“लाल”(6) “रतन”(7) क्यों छोड दिया ॥
नाम जपन क्यों छोड़ दिया . . .

जिन सुमिरन ते अति सुख पावे,
सो सुमिरन क्यों छोड़ दिया
“खालस” इक भगवान् भरोसै,
तन-मन-धन क्यों ना छोड़ दिया ॥
नाम जपन क्यों छोड़ दिया . . .