मैं पापों से तङ्ग आ चुका

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मैं पापों से तङ्ग आ चुका

मैं पापों से तङ्ग आ चुका,
दया दृष्टि कब दिखाओगे ?
मेरी नैया भटक चुकी है,
प्रभु पार कब लगाओगे ?
मैं पापों से तङ्ग आ चुका,
दया दृष्टि कब दिखाओगे ?

ना रुक पाईं अपनी मस्तियाँ,
मौज मजे़ में खो गए,
जगाना था अपने मन को मगर,
स्वार्थ बिछाकर सो गए,
यदि चलता रहा यूँ जीवन,
सही मार्ग कब दिखाओगे ?
मैं पापों से तङ्ग आ चुका,
दया दृष्टि कब दिखाओगे ?

बरस रही है कृपा,
तुम्हारे ही संसार में,
तुम्हारे रङ्ग-ढङ्ग दिख रहे हैं,
लगे हुए हैं निहारने,
नज़र तो अब समझ रही है,
मन को कैसे बनाओगे?
मैं पापों से तङ्ग आ चुका,
दया दृष्टि कब दिखाओगे ?

तुम्हारे अपने सङ्ग मुझे,
राह दिखा के ले चलो,
मुझे सत्य ज्ञान वेदों का,
पढ़ा सुना के ले चलो,
घड़ी चल चुकी ना वो रुकेगी,
मुझे कैसे तुम बचाओगे?
मैं पापों से तङ्ग आ चुका,
दया दृष्टि कब दिखाओगे ?

समझ रहा हूँ मैं यहाँ ,
तुम्हारे सद्-व्यवहार में,
तुम्हारे सङ्ग जो चला है,
अपने अच्छे संस्कार से,
न संशय अब रहा है मन में,
सही लक्ष्य तुम बताओगे
मैं अब तुमको समझ चुका,
मुझे राह तुम बताओगे
यदि भूले, भटक गया,
मुझे थामने तुम ही आओगे
मैं पापों से तङ्ग आ चुका,
दया दृष्टि कब दिखाओगे ?
मेरी नैया भटक चुकी है,
प्रभु पार कब लगाओगे ?
मैं पापों से तङ्ग आ चुका,
दया दृष्टि कब दिखाओगे ?