यह मत कहो कि जग में कर सकता क्या अकेला

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यह मत कहो कि जग में कर सकता क्या अकेला

यह मत कहो कि जग में
कर सकता क्या अकेला
लाखों में वार करता
इक सूरमाँ अकेला

आकाश में करोड़ों
तारें हैं टिमटिमाते
अन्धकार जग का हरता
इक चन्द्रमा अकेला

लोहे की पटरियों पर
होते अनेक डिब्बे
लेकिन सभी को इञ्जन
है खींचता अकेला

होते हैं ओखली में
अनगिनत धान के कण
लेकिन सभी को मूसल
दल डालता अकेला

एक रोज शहाजहाँ के
दरबार में अमरसिंह
अपनी कटार का बल
दिखला गया अकेला

लङ्का पुरी जला के
असुरों का मद मिटा के
हनुमान राम दल में
मिल आ गया अकेला

जापान में सजाकर
आजाद हिन्द सेना
नेता सुभाष जौहर
दिखला गया अकेला

था कुल जगत् विरोधी
तिस पर ऋषि दयानन्द
वैदिक धरम का झण्डा
लहरा गया अकेला

यह मत कहो कि जग में
कर सकता क्या अकेला
लाखों में वार करता
इक सूरमाँ अकेला