दैव्यजन तुम हो वरुण, नित कृपा करने वाले
दैव्यजन तुम हो वरुण
नित कृपा करने वाले
गिरते पड़ते हुए हम
यत्न हैं करने वाले
सत्य धर्म है जो तुम्हारा
हम अखण्डित करते
राजद्रोह करके बने
खुद को ही छलने वाले
दैव्यजन तुम हो वरुण
नित कृपा करने वाले
जो भी हमें प्राप्त है
ना समझे के कीमत क्या है?
फिर भी दायित्व तुमने
ले रखा प्रजा का है
हमने जो द्रोह किया
लाख तुमने समझाया
जाने अनजाने में ना समझे
ये व्यवहार है क्या
तुम जो यह भी ना बताओ
कि क्यों रुष्ट हो हमसे
कहाँ रह जाएँगे फिर हम
ना सम्भलने वाले
दैव्यजन तुम हो वरुण
नित कृपा करने वाले
जिन्दगी व्यर्थ नहीं
हमको यदि करना है
राजद्रोह त्याग के
अपराध नहीं करना है
कर नहीं सकते हमें नष्ट
तुम हो प्यारे वरुण !
इसलिए चाहते हैं
हो समीप करके यजन
शुद्ध कर लें हृदय तो
शक्ति दो प्यारे भगवन् !
राजद्रोह त्याग के बने
सत्य पे चलने वाले
दैव्यजन तुम हो वरुण
नित कृपा करने वाले
चाहे तुम से हमें निस्तार
मिले या कि नहीं
धन्य होंगे जो आशीष
वरुण दे दो यही
यह तो हम जान गए
तुम सचेत करते हो
तुम भले हो हमारी भूलें
तो संयम से सहीं
भावी जीवन में सम्भल जाएँ
वरुण कर दो सबल
अब लगे पाप-दुरित
से भी तो डरने वाले
दैव्यजन तुम हो वरुण
नित कृपा करने वाले
गिरते पड़ते हुए हम
यत्न हैं करने वाले
सत्य धर्म है जो तुम्हारा
हम अखण्डित करते
राजद्रोह करके बने
खुद को ही छलने वाले
दैव्यजन तुम हो वरुण
नित कृपा करने वाले










