प्रभु मुझे अपना बल दे देकर, पाप से सतत् बचाओ
प्रभु मुझे अपना बल दे देकर
पाप से सतत् बचाओ
मैं हूँ अज्ञानी, ज्ञान मुझे देकर
क्रतु निष्काम कराओ
मेरे पाप का मूल अज्ञान है
पाप का पालन – शूल समान है
बुद्धि-प्रकाश जगाओ
प्रभु मुझे अपना बल दे देकर
पाप से सतत् बचाओ
पुण्य का जो ऐश्वर्य दिया है
उसमें तेरा दिवि दर्श मिला है
मेरे जागृत-आत्मा को मृदु
आनन्द-रस और हर्ष मिला है
वर्तमान और निकट-भविष्य में
रहूँ दूर मैं पाप से
पाप-अनिष्ट ना होने पाए
रक्षा माँगूँ आपसे
होऽऽऽऽऽऽऽ
सत्य में प्रेरित कराओ
प्रभु मुझे अपना बल दे देकर
पाप से सतत् बचाओ
अर्य हो तुम प्रभु आनन्द-दायक
सकल ब्रह्माण्ड है विस्तृत-वश में
कवितर हो तुम ज्ञान-विज्ञान के
ऐसे ज्ञानी कोई ना जग में
पाप-परास्त में प्रेरित करता
सत्य कर्म की भरता हामी
वैदिक-धर्म का ज्ञान बढ़ाकर
हमें बनाता है निष्कामी
होऽऽऽऽऽऽऽ
सात्विक हमें बनाओ
प्रभु मुझे अपना बल दे देकर
पाप से सतत् बचाओ
केवल भक्ति करूँ ना अकेले
अन्य को भक्ति में लगाऊँ
कहूँ ना मैं ही भक्त तुम्हारा
सब भक्तों का साथ दिखाऊँ
मण्डलियों में स्तुति भजन और
कीर्तनों का रङ्ग जमाऊँ
नाच उठे मन मोर बावरा
मन-मस्ती में मगन हो जाऊँ
होऽऽऽऽऽऽऽ
भक्ति का रङ्ग चढ़ाओ
प्रभु मुझे अपना बल दे देकर
पाप से सतत् बचाओ
मैं हूँ अज्ञानी, ज्ञान मुझे देकर
क्रतु निष्काम कराओ
मेरे पाप का मूल अज्ञान है
पाप का पालन – शूल समान है
बुद्धि-प्रकाश जगाओ
प्रभु मुझे अपना बल दे देकर
पाप से सतत् बचाओ










