यज्ञ हैं कई और सब है सही
यज्ञ हैं कई और सब है सही
पर प्रीति श्रद्धा बिन यज्ञ नहीं
लोकोपकार के नित शुभ कर्म ही
मन और हृदय को करते पवि
यज्ञ हैं कई और सब है सही
पर प्रीति श्रद्धा बिन यज्ञ नहीं
जिनके मन में विषय वासना
की जले आग बड़ी
जिससे बढ़े विपदा
दु:ख के बादल भी घिरते कई
ऐसे इन लोगों को
करें सावधान हम यज्ञ है यही
यज्ञ हैं कई और सब है सही
पर प्रीति श्रद्धा बिन यज्ञ नहीं
ऐसे भले कार्यों में
विघ्न कष्ट बहुत ही आते हैं
किन्तु जो हैं धीर
निज क्रतुओं में
दक्षता लाते हैं
वो विचलित नहीं होते
ऐसे याज्ञिक होते हैं यति
यज्ञ हैं कई और सब है सही
पर प्रीति श्रद्धा बिन यज्ञ नहीं
जैसे इस आगी से
मैंने खुद को बचाया, संयम से
ऐसे ही, निज यत्न से
अन्धकार हटाऊँ जन-मन से
यह हरी-भरी शुभ भावना
जागे मेरे मन में, कहीं ना कहीं
यज्ञ हैं कई और सब है सही
पर प्रीति श्रद्धा बिन यज्ञ नहीं
कैसी है बात अद्भुत
पहले साधक यज्ञ राह पर था
उनको जब किया पूरा
तो वह लोगों की चाह पर था
ऐ मनुष्यो ! ज़रा सोचो
वैदिक-आध्यात्मिक मर्म है यही
यज्ञ हैं कई और सब है सही
पर प्रीति श्रद्धा बिन यज्ञ नहीं
लोकोपकार के नित शुभ कर्म ही
मन और हृदय को करते पवि
यज्ञ हैं कई और सब है सही
पर प्रीति श्रद्धा बिन यज्ञ नहीं










