सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस हे पिता ! आता रहे

0
60

सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस हे पिता ! आता रहे

सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे
ईश मेरा मन तुम्हारे
गीत-गुण गाता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

शान्ति वातावरण में शुभ
इष्ट-प्रीति के लिए
ध्यान व्यापक वेद का,
आनन्द बरसाता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

इन्द्रियाँ वश में रहें,
पावन क्रियाओं में लगे
प्राण के आयाम से,
सब रोग दुःख जाता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

सृष्टि रचना का सु-चिन्तन,
पाप का मर्षण करें
मेरा मन तेरे गुणों को,
नाथ अपनाता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

पूर्व दक्षिण पश्चिम उत्तर,
नीचे-ऊपर की दिशा
तेरे दर्शन के लिए मन,
परिक्रमा करता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

हो न मुदित अधिपति वा
रक्षिता ईश्वर तुझको
द्वेष नर जगदीश से
कर्मों का फल पाता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

मैं उपासक ब्रह्म की
अनुभूति का रस ले रहा
सर्व द्रष्टा देव का
दर्शन मुझे भाता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

सौ बरस से भी अधिक
देखूँ सुनूँ बोलूँ सदा
स्वावलम्बी देह सारी
आयु हे त्राता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

ओ३म् रक्षक जग नियन्ता,
भू: भुवः स्वः ईश्वर
जाप गायत्री सुपावन,
ज्ञान चित्त लाता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

देव सवितः श्रेष्ठ तेरा,
भर्ग हम धारण करें
बुद्धियों में प्रेरणा
आलोक सब आता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

ईश्वर करुणानिधे !!
जप और सन्ध्या कर्म से
चार फल की सृष्टि हो
तेरी दया दाता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

प्रभु शिवशंकर मयस्कर
हो नमस्ते कर रहे
पाल श्रद्धा भक्ति के
सद्-भाव दिखलाता रहे

सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! मुझे आता रहे
ईश मेरा मन तुम्हारे
गीत-गुण गाता रहे
सन्ध्या-वन्दन में मुझे रस
हे पिता ! आता रहे

स्वर :- श्री गुलाब सिंह जी राघव