तेरे करम से बेनियाज़, कौन सी शय मिली नहीं

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तेरे करम से बेनियाज़, कौन सी शय मिली नहीं

तेरे करम से बेनियाज़
कौन सी शय मिली नहीं
तेरी दया से हे प्रभु
कौन सी शय मिली नहीं


झोली ही मेरी तङ्ग है
तेरे यहाँ कमी नहीं
तेरी दया से हे प्रभु

जीने को जी रहा हूँ मैं
दाता तेरे बगैर भी
जिन्दगी जिसको कह सकूँ
ऐसी तो जिन्दगी नहीं
तेरी दया से हे प्रभु

कब से पुकारता है दिल
सुनता मगर कोई नहीं
मेरा तो इस जहान में
तेरे सिवा कोई नहीं
तेरी दया से हे प्रभु

माना कि मैं गरीब हूँ
माना कि मैं फकीर हूँ
मुझ से न ऐसे रूठिए
जैसे मेरा कोई नहीं


तेरी दया से हे प्रभु
कौन सी शय मिली नहीं
झोली ही मेरी तङ्ग है
तेरे यहाँ कमी नहीं


तेरी दया से हे प्रभु
तेरी दया से हे प्रभु
तेरी दया से हे प्रभु

स्वर :- श्री कंचन कुमार जी

मुझ से न ऐसे रूठिए (1) :- आनन्दस्वरूप ईश्वर कभी रूठते नहीं हैं, प्रथम दृष्टि में यहाँ सैद्धान्तिक दोष है क्योंकि ईश्वर सदा एकरस आनन्द में रहते हैं, रूठते नहीं लेकिन अल्पज्ञ-भक्त अपनी कमजोरी को अन्य पर डालने की आदत से बाध्य है अतः यहाँ रचनाकार ने ईश्वर को रूठने वाला बता दिया | ईश्वर उपासना से भक्त ही दूर जाता है, ईश्वर की कर्म-फल व्यवस्था को न समझने के कारण भक्त ही रूठता है और उपासना बन्द भी कर देता है लेकिन ईश्वर आनन्द स्वरूप हैं, निर्विकार हैं सदा सबका कल्याण हित चाहते हैं इसलिए सर्वाधार, दयालु बन कर सब पर करुणा करते हैं | सादर – विश्वप्रिय वेदानुरागी