हे अग्ने !! तेजोमय विश्वपति, हम हैं मूढ़ तुम महाज्ञानी सुधी

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हे अग्ने !! तेजोमय विश्वपति, हम हैं मूढ़ तुम महाज्ञानी सुधी

हे अग्ने !! तेजोमय विश्वपति !!
हम हैं मूढ़ तुम महाज्ञानी सुधी
हमारी सांसारिक महत्ता-दृष्टि
क्या जाने तुम्हें हम हैं मूढ़-मति
हे अग्ने !! तेजोमय विश्वपति !!

ये गज, रथ, घोड़े, बंगले, सोना, चाँदी
इसी में चला ली भोगों की आँधी
ये धन-माल, सम्पत्ति , सन्तति, भूमि
इसी में रमा ली है मस्त गति
ये रूप-धनी आत्मा सोया पड़ा
और कर दी जीवन की नगरिया-क्षति
क्या जाने तुम्हें हम हैं मूढ़-मति
हे अग्ने !! तेजोमय विश्वपति !!

नहीं चेतना है, क्यों देह ना खिला
कहाँ क्यों क्या करना, ना लक्ष्य मिला
सभी इन्द्रियाँ भोग-रोग बनीं
इसी को इतिश्री बना चल पड़ी
प्रभु ने बनाया था राजा हमें
मन, बुद्धि, प्राण आदि ने की दुर्गति
क्या जाने तुम्हें हम हैं मूढ़-मति
हे अग्ने !! तेजोमय विश्वपति !!

बनाना था देह-राष्ट्र को यज्ञरूप
करना था अध्यात्म साधन में कूच
वासना भोगों की कर डाली लूट
राष्ट्र बना जर्जर ना बना सूच
ऐसी आत्मा को हम धिक्कार करें
जो चाट रहा प्रकृति-युवती
क्या जाने तुम्हें हम हैं मूढ़-मति
हे अग्ने !! तेजोमय विश्वपति !!

अन्तर ज्ञान ज्योति में पलकर जागें
हे प्यारे आत्मन् ! मूढ़ता को त्यागे
ना वशवर्ती हों इन्द्रियों के आगे
सोई आत्मा जागे अमृत को चाखे
ज़रा अपनी सच्ची महत्ता जाने
उद्धार करें, करके सात्विक मति
क्या जाने तुम्हें हम हैं मूढ़-मति
हे अग्ने !! तेजोमय विश्वपति !!
हम हैं मूढ़ तुम महाज्ञानी सुधी
हे अग्ने !! तेजोमय विश्वपति !!