ब्रह्माण्ड की, जब थी ना सत्ता

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ब्रह्माण्ड की, जब थी ना सत्ता


ब्रह्माण्ड की, जब थी ना सत्ता
एक रस में थी, तेरी ही महत्ता
बिन बाधित रहेगी सत्ता
चलती रहेगी जग-नैया
हे स्वामिन् !!!

चन्द्रमा सूर्य व तारे
ग्रह-उपग्रह सुन्दर नज़ारे
ज्योतिपुञ्ज ज्योतिर्हीन लोक
आधारित रहते तुम्हारे
तुम धारक इन्हीं के हो


पालक इन्हीं के हो
उत्पादक सृष्टि है सोमैया
सर्वस्वामिन् स्वामिन्
अन्तर्यामिन् दामिन


ब्रह्माण्ड की जब थी ना सत्ता
एक रस में थी, तेरी ही महत्ता
बिन बाधित रहेगी सत्ता
चलती रहेगी जग-नैया
हे खिवैया !!

लोक लोकान्तर के द्वारा
बहाई है भोगों की धारा
करना चाहते हैं अर्चा
पर भेंट क्या दें हमारा?


अपना तो कुछ ना,
दिया है तुम्हारा
देना है क्या ? रत्न-रुपैया ?
सर्वस्वामिन् स्वामिन् !!!
अन्तर्यामिन् दामिन !!!


ब्रह्माण्ड की जब थी ना सत्ता
एक रस में थी, तेरी ही महत्ता
बिन बाधित रहेगी सत्ता
चलती रहेगी जग-नैया
हे खिवैया !!

कृतज्ञता-ज्योत तुम्हारी
और अर्पित श्रद्धा हमारी
तेरा दिया तुझको धरते
निष्काम तू – तुझको वरते


यह प्रीति का उपहार
दें तुझको हर बार
लाएँ तेरे द्वार पे पैंयाँ
सर्वस्वामिन् स्वामिन् !
अन्तर्यामिन् दामिन !


ब्रह्माण्ड की जब थी ना सत्ता
एक रस में थी, तेरी ही महत्ता
बिन बाधित रहेगी सत्ता
चलती रहेगी जग-नैया
हे खिवैया !!