बल-धन के लिए यह देह-कलश है
बल-धन के लिए यह देह-कलश है
वीर्य सोम का सच्चा धन
इसे क्षीण ना करना सञ्चित रखना
दृढ़ निश्चय से करना प्रण
बल-धन के लिए यह देह-कलश है
इस वीर्य को सञ्चित करके बना लो
घृत का उद्दीपित दीपक
और ऊर्ध्वरेता बनकर के
बन जाओ इन्द्र-प्रभु-सेवक
तुम शीघ्र प्रभु दर्शन हेतु
कर लो मन को उत्साहित
इस वीर्य की शुभ इच्छाओं को
बारम्बार करो तरङ्गित
यदि साथ लिया प्रभुवर प्रीतम का
समाज-सेवा का ले लो प्रण
जन समाज के प्रति रहोगे तुम
कर्तव्य परायण – कर्तव्य परायण
बल-धन के लिए यह देह-कलश है
तुम दान पुण्यों के बीजों से
कर लो पुरुषार्थ की खेती
ना भी चाहो देना पड़ेगा
यह लक्ष्मी स्थिर ना रहती
दान जो स्वेच्छा से देता है
जीवन में होता है विजयी
पुरुषार्थ ही तो है रामबाण
तीर निशाने पे लगता सही
दान वाले शुभकर्मों से दानी
बन जाते हैं सर्वोत्तम
धन के लोभी कुत्सित कर्मों से
बन जाते हैं अति कृपण
बल-धन के लिए यह देह-कलश है
देवता दानी सदाचार से
जीवन को आदर्श बनाते हैं
पुरुषार्थियों के हैं इन्द्र सहायक
अपनी शरण ले जाते हैं
सत्यवादी सदाचारी को
देते हैं सफलता का आशीष
दुष्ट लोभी दुराचारी को देते हैं
दण्ड वो न्यायाधीश
आओ बन जाएँ हम पुरुषार्थी
बन जाएँ दानी देव दृहण
दयावान प्रभु इन्द्र होगा सहायक
देगा हमें सन्तोष का धन
बल-धन के लिए यह देह-कलश है
वीर्य सोम का सच्चा धन
इसे क्षीण ना करना सञ्चित रखना
दृढ़ निश्चय से करना प्रण
बल-धन के लिए यह देह-कलश है
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * २८.३.२०२२ २.०५ मध्यान्ह
राग :- देस
गायन समय रात्रि का दूसरा प्रहर, ताल दादरा ६ मात्रा
शीर्षक :- देव-पुरुष कुत्सित आचरण नहीं करते
वैदिक भजन 875 वां
*तर्ज :- *
0225-825
शब्दार्थ :-
ऊर्ध्वरेता = पूर्ण ब्रह्मचारी,जो वीर्य स्खलन ना करता हो वीर्य शुक्र, ओज, शक्ति
कर्तव्य परायण = कर्तव्य में लगा हुआ
कुत्सित = भ्रष्ट, निन्दित
कृपण = कंजूस
दृहण = दृढ़ करने की इच्छा
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
देव-पुरुष कुत्सित आचरण नहीं करते
विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न वस्तुएं सोम कहलाती हैं। शरीर में वीर्य सोम है।
हे मानवो ! तू अपने जिसे वीर्य रूप सोम को देह- कलश में बड़े प्रयत्न से संचित किया है उसे क्षीण मत करो किन्तु ऊर्ध्व रेता अब बनकर महान इन्द्र प्रभु को पाने के लिए मन में उत्साह धारण करो। यदि तुम संचित वीर्य को प्रभु प्राप्ति के दीपक का घृत बना लोगे तो शीघ्र ही तू है प्रभु के दर्शन हो जाएंगे। पर प्रभु- दर्शन के लिए उत्साह होना चाहिए, मन तरंगित होना चाहिए, मन में तीव्र अभिलाषा होनी चाहिए। साथ ही तुम यह ना सोचो कि प्रभु को पा लिया तो समाज के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य अवशिष्ट नहीं रहा। तुम धन- संपत्ति कमाने में लोकोपकारार्थ
चारों ओर उसका दान करने के लिए भी पुरुषार्थ करो। यदि तुम दान नहीं भी करा चाहोगे, तो भी क्योंकि यह संसार का नियम है कि लक्ष्मी कहीं स्थिर होकर नहीं रहती, किन्तु रथ के चक्र के समान घूमती रहती है और एक के पास से दूसरे के पास जाती रहती है, आता है तो भारी कमाई हुई धन सम्पत्ति किसी अन्य प्रकार से तुम से छिन जाएगी। इसलिए स्वेच्छा से दान करो। यदि तुम अपने जीवन में विजयी होना चाहते हो, उत्तम स्थिति प्राप्त करना चाहते हो और परिपुष्ट- समृद्ध होना चाहते हो तो पुरुषार्थ ही उसका रामबाण नुस्खा है। अतः पुरुषार्थी बनो, सत्वर कर्म करने वाले बनो। पर पुरुषार्थ के नाम पर कहीं कुत्सित कर्म ना करने ने लगना। स्मरण रखो, तुम जैसे देव पुरुष कदाचार के लिए जन्म नहीं लेते प्रत्युत सदाचार को अपना कर संसार में आदर्श उपस्थित किया करते हैं। अता तुम सदाचार की दिशा में ही पुरुषार्थ करो, इन्द्र प्रभु तुम्हारा सहायक होगा।
🎧875वां वैदिक भजन🕉👏🏽










