घर आये साधू जन का, करता जो तिरष्कार नहीं।
घर आये साधू जन का,
करता जो तिरष्कार नहीं।
बिना भजन के भोजन को,
जो होता कभी तैयार नहीं।
देशद्रोही दुष्ट जनों से,
करता जो कभी प्यार नहीं।
“धर्मी”सदां सुखी रहता है,
होता जीवन ख्वार नहीं।
मात-पिता और वृद्ध जनों की,
जो नर सेवा करता है।
“धर्मी”यश जग भर में फैले,
सदा मोद में रहता है।
बल विद्या को प्राप्त होय,
और कष्ट और के हरता है।
सौ से आयु अधिक मिलै,
और धर्म युद्ध में लड़ता है।
जिस सभा के अंदर धर्म सदा,
अधरम से मारा जाता है।
जिस सभा के अंदर सत्य झूठ से,
हार सदां ही पता है।
इस पर भी हर एक सभासद,
देख-देख हर्षाता है।
हर एक सभासद मरे तुल्य,
चाहे चलता फिरता खाता है।










