कमाई तेरी ले गए, लोभ के चोर

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कमाई तेरी ले गए, लोभ के चोर

कमाई तेरी ले गए, लोभ के चोर
एक तरफ था यज्ञ-सलोना
लोभ था दूजी ओर
कमाई तेरी ले गए, लोभ के चोर

यज्ञ का मार्ग किया अनदेखा
लोभ ने जाल बिछाया
दिव्य नाद बजा यज्ञ का मनहर
कूकर सुन ना पाया
श्वास-श्वास में जाप था प्रभु का
सुनता रहा वह शोर
कमाई तेरी ले गए, लोभ के चोर

शंख, दुन्दुभी, मेरिया गूंजें
युद्ध यात्रा थी बल पर
गरज गोलों की सुनी संग्राम में
था सोम रसों का दौर
कमाई तेरी ले गए, लोभ के चोर

यज्ञ भावना वैदिक वीर की
बन गई मुक्ति-धाम
राख बन गई देह-दधीचि
अस्थि रही निष्काम
यज्ञ-शेष लाखों वीरों की
दे गए वो चितचोर
कमाई तेरी ले गए, लोभ के चोर

इन पावन राखों के भीतर
जाएँ ना लोभ के कूकर
राख वीरों की कूकर-जीभें
कभी न जाएँ छूकर
किए न्योछावर प्राण वीरों ने
करें उन पर हम गौर
कमाई तेरी ले गए, लोभ के चोर
एक तरफ था यज्ञ-सलोना
लोभ था दूजी ओर
कमाई तेरी ले गए, लोभ के चोर

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * ८.१०.२००८ १२.४५ मध्यान्ह

राग :- खमाज
राग का गायन समय रात्रि का द्वितीय प्रहर, ताल कहरवा ८ मात्रा

शीर्षक :- यज्ञ या लोभ ?
वैदिक भजन ८७८वां

*तर्ज :- *
826-0227

शब्दार्थ :-
सलोना = सुंदर
कूकर = कुत्ता
देह-दधीचि = दधीचि ऋषि की देह से निकली हुई हड्डियों से वज्र बनाकर इन्द्र ने शत्रुओं का नाश किया था।

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇

यज्ञ या लोभ ?
एक तरफ लोभ है दूसरी तरफ यज्ञ। मनुष्य जिसे चाहे चुन ले। यजमान के हृदय से प्रतिक्षण परहित की भावना बोल रही है। उसका श्वास-श्वास मानो प्रभु के नाम का जाप है,प्रभु की प्रजा के कल्याण के लिए प्राणों की बोल रही आहुति है। इस यज्ञ का एक दिव्य नाद है जिसे यजमान का हृदय ही सुन सकता है। शंखों, दुन्दुभियों मेरियों की गुंजार में यह नाद गरज रहा है। युद्ध- यात्रा में पग-पग पर इस नाद की गूंज थी। लोगों की गरज के साथ-साथ इस नाद की सुरीली झंकार उठती थी और संग्राम के रूद्ररस को पवित्र सोमरस बना जाती थी। मृत्यु सा अकांड- तांडव अमर गणों का अलौकिक नृत्य सा बन रहा था। हजारों लाखों मनुष्य मौत के घाट उतारे गए, परन्तु वैदिक- वीर युद्ध स्थली को मुक्ति ही का घाट समझता रहा। उसकी यज्ञ की भावना ने उसे वास्तव में मुक्ति का घाट बना दिया है।
इस यज्ञ की हत्या आर्यवीर के हाथों होनी संभव है। जैसे पवित्र विधि का निर्माण उसने अपने दधीचिन्देह की पवित्र हड्डियों की बलि दे दे कर किया, उस पर वह किसी अपवित्र कूकर(कुत्ते) को प्यार करने दे–यह कब संभव हो सकता है? यज्ञ की ज्वाला में उसका शरीर भुन गया। उसका रोम-रोम झुलस चुका। आज उसका अंग-अंग अमर वीरों की पुण्य स्मृति का एक उज्जवल स्तंभ है। यह वह रात है जो लाखों शूरों के, स्वाहा हो चुके शरीरों का पवित्र यज्ञ शेष है। इसकी निष्पाप वीरता की रक्षा प्राण-पण से करनी है, भुन-भुन कर करनी है, झुलस-झुलस कर करनी है। इस पवित्र राख के निकट, लोभ रूपी कूकर को नहीं आने देना, उसकी लटकती जीभ को भी नहीं आने देना।
🎧878वां वैदिक भजन🕉👏🏽