प्रथम सुख “धर्मी” वह होता, तन में ना बीमारी हो।

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प्रथम सुख “धर्मी” वह होता, तन में ना बीमारी हो।

प्रथम सुख”धर्मी”वह होता,
तन में ना बीमारी हो।
दूजा सुख उसको कहते हैं,
घर में सम्मति भारी हो।
तीजा सुख वह कहलाता है,
पतिव्रता निज नारी हो।
चौथा सुख घर का उजियारा,
निज सुत आज्ञाकारी हो।

आताताई चाहे तरुण पुरुष हो,
बुड्ढा या ब्रह्मचारी हो।
महा मूढ या पंडित हो,
चहे वेद का परम पुजारी हो।
सभी जनों का शिक्षक हो,
और पूजा का अधिकारी हो।
“धर्मी”बिना विचारे मारे,
पुण्य जगत में भारी हो।

किसी को विष के द्वारा मारें,
किसी के आग लगाते हैं।
किसी के धन का हरण करें,
किसी का शीश झुकाते हैं।
कहीं किसी की भूमि छीनें,
कहीं त्रिया बहकते हैं,
“धर्मी”ऐसे “जन”जग में,
सब आताताई कहलाते हैं।

ईर्ष्या घृणा करने वाले,
जितने भी नर नारी हैं,
असंतोष निशदिन रहते हैं,
क्रोध मुखी जो भारी हैं।
हर जन पै जो शंका करते,
मांगे आयु सारी हैं,
“धर्मी”छे भांति के जन ये,
रहते बहुत दुखारी हैं।