तू कर प्रभु से प्रीत, यूँ ही दिन बीतते जाते हैं

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तू कर प्रभु से प्रीत, यूँ ही दिन बीतते जाते हैं

तू कर प्रभु से प्रीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं
तू हार के बाजी जीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं
तू कर प्रभु से प्रीत

शुरू से है ये ताना बना
आने के सङ्ग जाना
कुएँ से भर भर लोटे आए
खाली हुए रवाना
है यही जगत् की रीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं
तू कर प्रभु से प्रीत

दु:ख के धूप कभी है सिर पर
कभी है सुख की छाया
बदल बदल कर समय सभी पर
बारी बारी आया
वर्षा गर्मी कभी शीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं
तू कर प्रभु से प्रीत

सैकड़ों सङ्गी साथी इस जहाँ
बनें हैं तेरे सहारे
तू इनका है बहुत ही प्यारा
ये हैं तेरे प्यारे
पर वहाँ नहीं कोई मीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं
तू कर प्रभु से प्रीत

अब भी “नत्था सिंह” समझ/सम्भल जा
काफी समय बिताया
खुद बेसमझ जरा नहीं समझा
औरों को समझाया
लिख लिख कर गाया गीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं
तू कर प्रभु से प्रीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं
तू हार के बाजी जीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं
तू कर प्रभु से प्रीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं
तू कर प्रभु से प्रीत
यूँ ही दिन बीतते जाते हैं

रचनाकार :- श्री नत्थासिंह जी