घर वालों से मिलकर रहता, सज्जन का सम्मान करे।
घर वालों से मिलकर रहता,
सज्जन का सम्मान करे।
पर स्त्री माता सम समझे,
ईश्वर का गुणगान करे।
चोरी-चुगली दम्भ भरे ना,
मदिरा का ना पान करे।
“धर्मी”ऐसा जन ही जग में,
हर हृदय स्थान करे।
अपने सुख को पाकर”धर्मी”,
ना मन में हर्षाता है।
दूजे जन को दुखी देखकर,
ना मन में खुशी मनाता है।
औरों का उपकार करे,
ना देकर के पछताता है।
ऐसा जन ही जग के अंदर,
महापुरुष कहलाता है।
निंदनियों की निंदा ना हो,
पाप अधिक बढ़ जाता है।
उनके संग में श्रेष्ठ पुरुष भी,
पाप का भार उठता है।
कड़वा वचन कहे हितकारी,
वो ही श्रेष्ठ कहाता है।
“धर्मवीर”जब कोई धर्म करे तो,
तब धर्मी कहलाता है।
मदिरा का ना पान करे,
और ग्राम से वैर बढ़ावे ना।
ताबेदारी ना रूठे,
त्रिया को तरसावे ना।
राजा के संग झगडा करके,
कोई भी सुख पावे ना।
अधरम के मारग पर चल कर,
“धर्मी”कोई कहावे ना।










