हम प्रातः काल में हे दाता !\
हम प्रातः काल में हे दाता !
तेरा ही ध्यान लगाते हैं
मध्य काल में भी हम श्रद्धा से
प्रभु गीत तेरे ही गाते हैं
ओ३म् श्र॒द्धां प्रा॒तर्ह॑वामहे (1)
श्र॒द्धां म॒ध्यंदि॑नं॒ परि॑ । (1)
तेरा प्रेम समाया है मेरे दिल में
तेरे गीत प्रेम से गाते हैं
ओ३म् श्र॒द्धां सूर्य॑स्य नि॒म्रुचि॒ (1)
सूर्यास्त काल में भी श्रद्धा से
योगीजन आस्था सत्य-निष्ठा
विश्वास को मन में बसाते हैं
ओ३म् श्रद्धे॒ श्रद्धा॑पये॒ह न॑: ॥ (1)
ऋग्वेद का मन्त्र ये समझाये
है धर्म में जिसकी श्रद्धा वही
मन मन्दिर में तुझको पाते हैं
कोई भी काल हो जीवन का
श्रद्धा का हम आह्वाहन करें
महर्षि व्यास जी श्रद्धा को (2)
योगी की माँ बतलाते हैं (2)
हम प्रातः काल में हे दाता !
तेरा ही ध्यान लगाते हैं
मध्य काल में भी हम श्रद्धा से
प्रभु गीत तेरे ही गाते हैं
रचना व स्वर :- पूज्या माता श्रीमती मिथलेश जी आर्या
(1) :- ओ३म् श्र॒द्धां प्रा॒तर्ह॑वामहे श्र॒द्धां म॒ध्यंदि॑नं॒ परि॑ । श्र॒द्धां सूर्य॑स्य नि॒म्रुचि॒ श्रद्धे॒ श्रद्धा॑पये॒ह न॑: ॥
(ऋग्वेद 10/151/5)
अर्थात्
हम प्रातः मध्याह्न और सायं अर्थात् दिन भर अपने को श्रद्धावान् बनाये रखने का यत्न करें | यहाँ तक यत्न करें कि हमारा यह सारा जीवन श्रद्धा से ओत-प्रोत हो जाए |
यदि उपर्युक्त भजन पसन्द आया हो तो कृपया ऊपर लिखित वेद मन्त्र कण्ठस्थ करें | सादर विश्वप्रिय वेदानुरागी
(2) :- देखें योगदर्शन समाधिपाद-20 श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञा पूर्वक इतरेषाम्
कल्याणकारिणी श्रद्धा योगी की रुचि योग में बढ़ाती है, उसके मन को प्रसन्न रखती है और माता के समान कुमार्ग से बचाती हुई उसकी रक्षा करती है
.









