“श्रेष्ठ धूप वो ही जग में,जो भूमि उपज बढ़ाता है”

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(१)🌸🌹🙏🌲
श्रेष्ठ धूप वो ही जग में,
जो भूमि उपज बढ़ाता है।
पुल बनवावे हाथी राखे,
उत्तम दुर्ग बनाता है।
आधीनों से”कर”लेवे,
व्यापार में हाथ बढ़ाता है।
जंगल काटे शहर बसावे,
अन्न कोष में पाता है।

(२)🌲🌹🍀🌺
सज्जन गृहस्थी जन को चहिए,
पतित को पास बिठावे ना।
दुष्ट कर्म जो करने हारे,
उनका साथ लगावे ना।मिथ्यावादी नट कंजर को,
अपना मित्र बनावे ना,
“धर्मी”दम्भी जन के संग में,
जीवन कभी बितावे ना।

(३)🌸🌺🌹🪴
“खर”के सींग नहीं होता,
चाहे खर के सींग उपज आवे,
उसर अन्न नहीं होता,
चाहे ऊसर भूमि लहरावे।
बंध्या पुत्र नहीं होता,
चाहे वह भी सुंदर सुत जावे।
यह सब कुछ”धर्मी”हो सकता,
पर नारि का पार नहीं पावे।

(४)🌸🌺🌹🍀
शोक से बढ़कर दुनिया में,
ना शत्रु और कहाता है।
जहां पर रहता शोक वहां पर,
धीरज निकट ना आता है।
शास्त्र ज्ञान का लेश मात्र भी,
ज्ञान न रहने पाता है।
निश्चय समझो शोक ही “धर्मी”,
सर्वनाश का दाता है।