परीतो पिञ्चता सुतं सोमो य उत्तम छं हविः
दधन्यान यो नयो अप्स्वन्तरा सुषाव सोममद्रिभिः ॥
ऋ. ७.१०७.१ साम. ५१२, १३१३
तर्जः मेरी बीना तुम बिन रो ये
मेरी देवपुरी को सजाओ (2)
देवो ! देवो ! देवो !
मेरी देवपुरी को सजाओ ॥
विश्व के राजा इन्द्र नगरिया,
राजकुमार पधारे,
तुम अभिषेक अनूप रसों से,
कर दो मिलकर सारे,
और ताज उसे पहनाओ ॥
देवो ! देवो ! देवो !
मेरी देवपुरी को सजाओ
सोम रसों के बादल जैसे,पर्वत को नहलाए
सोम की बरखा हृदय पे बरसे, ध्यान की डुबकी लगाए
हाय ! कैसा आनन्द छाए।
देवो ! देवो ! देवो
मेरी देव पुरी को सजाओ ॥
भोग विलास की ना ये पदवी, आत्म-त्याग की वेदी
यज्ञिय राजकुमार ने इसको राष्ट्र हितों में दे दी
हवि उत्तम इसे बनाओ।
देवो ! देवो ! देवो !
मेरी देवपुरी को सजाओ










