यूं तो कितने ही महापुरुष हुए दुनिया में ।

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यूं तो कितने ही महापुरुष हुए दुनिया में ।

यूं तो कितने ही महापुरुष हुए दुनिया में ।
नहीं गुरुदेव दयानंद सा देखा हमने ।
नहीं गुरुदेव दयानंद सा सुना हमने । ।

छोड़ माता पिता घर बार और धन जन को ।
धार के ब्रह्मचर्य व्रत वो चल दिया वन को ।
कभी मरुस्थल तो कभी मार्ग था कांटो वाला ।
कभी हिमशैल शिखर तो कभी नदी नाला ।
खड्ग चमकाया किसी ने तो किसी ने भाला ।
फिर भी पीछे ना हटा सत्यधर्म व्रत वाला । १ ॥
यूँ तो कितने ही महापुरूष . . . . . .

धरा हनुमान ने था ब्रह्मचर्य पाने को ।
अपने स्वामी श्री रामचंद्र के रिझाने को ।
सुना है पाल ब्रम्हचर्य परशुराम ने था ।
पृथ्वी से नाम सत्य वंश का मिटाने को ।
धरा था ब्रह्मचर्य भीष्म पितामह ने भी ।
अपने पितु शांतनु को ही सुखी दिलाने को ।
किंतु गुरुदेव दयानंद ब्रह्मचारी ने ,
धरा था ब्रह्मचर्य जग को सुख दिलाने को ॥ २ ॥
यूँ तो कितने ही . . . . . . . .

दीन दुखियों की दशा देख दुखी होता था ।
सारा जग चैन से सोता था तब वो रोता था ।
जनकल्याण केसाधन सभी संजोता था ।
एक पल भी वो कभी व्यर्थ में न खोता था ।
योगी जन आज भी वो ध्यान मग्न रहते हैं ।
देख ऋषिवर की तपस्या वो यही कहते हैं ॥ ३ ॥
यूं तो कितने ही . .

ऋषि का देह दीप जबकि बुझने वाला था ।
दिवाली कहने को तो सच तो ये दिवाला था ।
आर्य जनता के हृदय में बड़ी घबराहट थी ।
किंतु ऋषिराज के मुख पर तो मुस्कुराहट थी ।
शांत मन हो महर्षि ने ये वचन उच्चारे ।
तेरी इच्छा पूर्ण हो हे परमपिता प्यारे ॥
समाधि ना मेरी कहीं तुम लगाना ।
न चद्दर न तुम पुष्प माला चढ़ाना ।
ना पुष्कर , गया अस्थियां लेकर जाना ।
ना गंगा में तुम मेरी भस्मी बहाना ।
ये झंझट ना तुम व्यर्थ के मोल लेना ।
मेरी अखियां खेत में डाल देना ।
हाय ! वो छिन गया अनमोल हमारा मोती ।
दीप एक बुझ गया घर घर में जगा कर ज्योति ॥
बड़े अचरज में देख ये गुरुदत्त विज्ञानी।
जो कि नास्तिक थे परम हो गए आस्तिक ज्ञानी।
स्वामी महाराज की महानताएं जग जानी।
झुके चरणों में बोलते थे सभी यह वाणी।।४।।
यूं तो कितने ही . . . . . . . .

जिसने मृत आर्य जाति को पुनः जिलाया है।
आप विष पी के वेदामृत हमें पिलाया है।
घर विधवा दलित अनाथों को दिलाया है।
जिसने बिछड़े हुओं को हमसे फिर मिलाया है।
ओ दयानन्द के बलिहारी क्यों न जाये हम।
क्यों न श्रद्धा से गीत ये प्रकाश गाये हम।।५।।