यही प्रार्थना करें

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ओ३म् उ॒च्छन्नु॒षस॑: सु॒दिना॑ अरि॒प्रा उ॒रु ज्योति॑र्विविदु॒र्दीध्या॑नाः ।
गव्यं॑ चिदू॒र्वमु॒शिजो॒ वि व॑व्रु॒स्तेषा॒मनु॑ प्र॒दिव॑: सस्रु॒राप॑: ॥

ऋग्वेद 7/90/4

यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें

यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें
उस विशाल ज्योति-प्रकाश को
निज-आत्मा में धरें
यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें

तेरे निरन्तर ध्यान से ईश्वर
दिव्य-प्रकाश ही मिले
ध्यान-कर्म में खोट न होवे
पाप-रहित मन रहे
यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें

ध्यानी में दोष कहाँ है उसको
प्रभु-प्रकाश ही मिले
निराकरण हो पाप का डर के
आत्मा प्रकाशित करे
यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें

नेत्रहीन ही तेज-प्रकाश में
ठोकर खाकर गिरे
सावधान जो चक्षु वाले
सोच समझ पग धरें
यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें

कर्महीन न रहा वो ध्यानी
नियम से जो गति करे
ध्यान से ज्योति आत्मसात् करे
दूर प्रसार भी करे
यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें

इस तप से आध्यात्म के जल की
शान्त धारायें बहें
और बहाये दोष रहे सहे
जीवन पावन करे
यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें

सरिता जल में बल है केवल
देह की शुद्धि करे
स्नान करे आध्यात्म के जल में
शुद्ध वो आत्मा रहे
यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें

यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें
उस विशाल ज्योति प्रकाश को
निज-आत्मा में धरें
यही प्रार्थना करें
प्रभु जी !! तेरे ध्यान में रहें

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन
साहनी जी – मुम्बई

राग :- भटियार ताल विलम्बित कहरवा भजन 412

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– ????????

निरंतर ध्यान करनेवाले विशाल
प्रकाश को प्राप्त करते हैं।
कौन सा पदार्थ ग्रहण करने योग्य है
और कौन सा त्यागने योग्य
इसे विवेक विचार कहते हैं,
और ग्रहण करने योग्य को ग्रहण करके
आत्मसात करने का नाम ध्यान है।
इस ध्यान का फल विशाल प्रकाश बतलाया है।

ध्यानियों के दिन सुदिन होते हैं,
उनकी दिनचर्या सधी हुई नियमित होती है।
वे निर्दोष होते हैं।
वो हिंसा,चोरी,निषिद्ध मैथुन,
कठोर वचन,चुगली,मित्रता प्रलाप,
द्रोह और नास्तिकता से दूर रहते हैं।
अधर्म से ही पाप होते हैं।
ध्यानीजन पाप रहित होते हैं।
उनके ज्ञान,कर्म,मन,
वचन में खोट नहीं होती

उनके शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक
व्यवहार में नि:सन्देह असत्य नहीं होता।
वो अपने कर्म से युक्त हुए निर्वाह करते हैं।
वे अपने कर्त्तव्य कर्म में सदा लगे ही रहते हैं।
ध्यान करते हुए वो विशाल प्रकाश को
प्राप्त करते हैं।

पाप अन्धकार होता है।
प्रकाश में अन्धे को ठोकर लग सकती है।
आंखों वाले सावधान रहें तो
ठोकर से बच सकते हैं।
ध्यानी हमेशां सावधान रहते हैं,
इसलिए वो प्रकाश को पाकर
निरवकाश हो जाते हैं।
वो नियमों को जान समझकर गति करते हैं।
योग के द्वारा वो अपनी इन्द्रियशक्ति बढ़ा लेते हैं।
उनके तप के प्रभाव से अध्यात्म जल की
शान्त धाराएं बहने लगती हैं,
रहे सहे दोष भी ये धाराएं बहा ले जातीं हैं।
ओ३म्।