ते वो हृदे मन॑से सन्तु य॒ज्ञा जुष्टय॑सो अ॒द्य घृतर्निर्णिजो गुः।
प्र व॑ः सुतासौ हरयन्त पूर्णाः क्रत्वे दर्शाय हर्षयन्तः पीताः।। ऋ. ४.३७.२
तर्जः मयनी पोई न्यान मयनी पोई
यज्ञ हैं कई और सब हैं सही
पर प्रीति श्रद्धा बिन यज्ञ नहीं
लोकोपकार के नित शुभ कर्म ही
मन और हृदय को करते पवि॥
यज्ञ हैं कई…
जिनके मन में विषय वासना की जले आग बड़ी
जिससे बढ़े विपदा, दुःख के बादर भी घिरते कई
ऐसे इन, लोगों को, करें सावधान हम, यज्ञ ये यही ॥
यज्ञ हैं कई…
ऐसे भले, कार्यों में विध्न बहुत ही आते हैं
किन्तु जो, हैं धीर, निज क्रतुओं में दक्षता लाते हैं
वो विचलित नहीं होते, ऐसे याज्ञिक होते हैं यति॥
यज्ञ हैं कई…
जैसे इस, आगी से, मैंने खुद को बचाया संयम से
ऐसे ही, निज यत्नों से, अन्धकार हटाऊँ, जन-मन से
ये हरी-भरी, शुभभावना जागे मेरे मन में कहीं ना कहीं॥
यज्ञ हैं कई…
कैसी है, बात अद्भुत ! पहले साधक यज्ञ राह पर था
उनको जब, किया पूरा, तो वो लोगों की चाह पर था
ऐ मनुष्यों! जरा सोचो, वैदिक आध्यात्मिक मर्म यही॥
यज्ञ हैं कई…
(दक्षता) निपुणता। (यति) योगी, सन्यासी, त्यागी।










