अवा नो वाजयुं रथं सुकरं ते किमित्यरि। अस्मान्त्सु जिग्युषस्कृधि
।। ऋ. ८.८०.६
तर्जः मयिलाय हो मयिलाय परन्तुवाय मळयिल
कई बार हम चाहते, वाज रथ यूँ आगे बढ़ता जाए
धन बल ऐश्वयों की न्यूनता कभी भी ना आए।
है प्रभु तुमसे प्रार्थना, तुम इस रथ की रक्षा करो
वरदान मिलता रहे तुमसे, हमपे ऐसी कृपा कर दो
जितना तुम से वाज मिले, उतने ही उन्नत हों
तेरा संग किया करते ही तद्वत कर्मठ हों।
कई बार…
जीवन की इस दौड़ में हमको उत्तरोत्तर बढ़ना है भगवन् (2)
जब तक लक्ष्य को पा न सकें हम (2)
प्रभु हमें बल दे, तेरी शरण पड़े॥
कई बार…
हर ले दुरित बाधायें, प्रभा दे श्रेष्ठ विजेता हमें बना दे (2)
आसुरी वृत्तियाँ रहें पराजित प्रभु हमें बल दे तेरी शरण पड़े॥
कई बार…
ये रथ वाज का तीरथ कर दे, इस जीवन को यज्ञ से भर दे (2)
वाजयु-रथ ले चलें सुपथ पे (2) प्रभु हमें बल दे तेरी शरण पड़े।
कई बार…
तेरे लिए प्रभु सब कुछ संभव और परिपूर्ण है तेरा अनुभव (2)
वाज से तेरे क्यों वञ्चित हों? (2)
प्रभु हमें बल दे तेरी शरण पड़े॥
कई बार…
(वाज) धन ऐश्वर्य और बल। (दुरित) पाप। (तदवत्) उसी प्रकार। (कर्मठ) उद्यमी, मेहनती।










