वही तर गया प्रभु का जिसने लिया सहारा।
वही तर गया प्रभु का
जिसने लिया सहारा।
भव से हो पार किश्ती
मिल जाता है किनारा॥ टेक ॥
भटके से क्या हो दर-दर,
तेरा मीत तेरे अन्दर ।
काशी गया में क्यों तू
फिरता है मारा-मारा॥
वही तर गया प्रभु का….॥1॥
मन का तू अपने दर्पण,
कर साफ होगा दर्शन।
प्रियतम नजर में आये
नहीं दूर है वो प्यारा॥
वही तर गया प्रभु का….॥2॥
वैसे तो हर जगह है,
हर जरें में रमा है।
हर गुज्चे गुलकली में
उसका ही है नजारा॥
वही तर गया प्रभु….॥३॥
मत पूछ वो कहां है,
तेरे दिल में ही बसा है।
जब इश्क होगा कर्मठ
मिलना तभी गवारा॥
वही तर गया प्रभु का….॥4॥










