वही सच्चा-करतार
वही सच्चा-करतार,
सारे जग के पालनहार
मन की नगरी में रहता
है निराला कारीगर
मानव का चोला,
उसने कैसा बनाया है।
सुई और धागा,
कोई हाथ न लगाया है।
इसमें आठ चक्र नवद्वार
मिलता यह न बारम्बार
मन की नगरी…
दुनियाँ में रखना
जी पाँव सम्भल के,
बचना है मुश्किल
पापों के फल से,
नाव डूबेगी मझधार-विषयों
से न कर तु प्यार।
मन की नगरी…
भव से पार हुआ,
उसका जो हो गया,
“नन्दलाल” डुबा वह
जो विषयों में खो गया,
करता रहा पापों से
प्यार कैसे होगा बेड़ा पार।
मन की नगरी…..










