विपदि धैर्यमथाभ्युदयेक्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः। यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृति सिद्धमिदं हि महात्मनाम् ।।
आपत्काल में धैर्य को धारण करना, उच्च पद और अन्य सामर्थ्य होने पर क्षमा का भाव, सभा में वाणी का चातुर्य, युद्ध में पराक्रम, यश में रुचि, वेदादि का स्वाध्याय, ये गुण महापुरुषों में स्वभावतः ही होते हैं। इन पर क्रमशः विचार करना उचित होगा।
- धैर्य – धारा के प्रतिकूल होने अथवा नौका के किसी भँवर में फँस जाने पर ही नाविक के धैर्य की परीक्षा होती है। ‘विकार हेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चित्तांसि त एव धीराः।’ विकार का अवसर उपस्थित होने पर भी जिनका चित्त विचलित नहीं होता वे ही धीर पुरुष हैं जिसका संकल्प सुदृढ़ है वही प्रबल झञ्जावात का सामना कर सकता है। सामान्य लोग ऐसे अवसरों पर अपना धैर्य छोड़ बैठते हैं। उनकी गणना तिनकों में की जाती है। जो तूफान का डटकर मुकाबला करते हैं और किसी भी प्रलोभन के सामने नतमस्तक नहीं होते। संसार में उनका ही नाम अमर होता है।
- क्षमा – क्षमा उसे कहते हैं जब अपना अपमान या हानि किसी के द्वारा किया गया हो और उसे क्षमा कर दिया जाये। क्षमा वीरों का भूषण है। कायर पुरुष की क्षमा उसकी मजबूरी है।
- याद रखो-
- क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल है। उसका क्या जो दन्तहीन विषहीन विनीत सरल है।
- कोई विषधर सर्प किसी को नहीं काटे तो उसकी क्षमा समझ में आती है। जिस सर्प के विष के दाँत नहीं हों अथवा उसमें विष की ग्रन्थियाँ ही नहीं रहें, यदि ऐसा सर्प किसी को नहीं काटता तो उसकी क्षमा का कोई महत्व नहीं है।
- सुकरात, ईसामसीह, महर्षि दयानन्द आदि की गणना ऐसे ही महापुरुषों में की जाती है जिन्होंने अपने प्राण लेने और विष पिलाने वालों को भी क्षमा कर दिया।
- वक्तृत्व कला – बोलते सभी हैं परन्तु कुछ व्यक्तियों में जन्म-जात बोलने का गुण होता है। कोयल के समान मधुर, सारगर्भित और जनता के हित में दिया गया भाषण सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ नेता जी सुभाषचन्द्र के ये शब्द सुनकर हजारों युवक-युवतियाँ उनकी सेना में भर्ती हो गये। माताओं ने अपने गले से आभूषण उतार कर उन्हें सहर्ष देशहित में दान दे दिया। ‘जय जवान जय किसान’ का उद्घोष करने वाले उस समय के प्रधान मन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने केवल अठारह मास में वह कार्य कर दिखाया जो पं. जवाहरलाल नेहरू अठारह वर्ष में नहीं कर सके। यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि जिनकी कथनी और करनी एक जैसी है, उसके शब्दों का ही प्रभाव जनता पर पड़ता है। केवल लच्छेदार भाषा लोगों को प्रभावित नहीं कर पाती। हृदय से निकले शब्द ही लोगों के हृदयों को आन्दोलित कर सकते हैं।
- युद्ध में पराक्रम – विश्व भर में ऐसे शूरवीरों की शौर्यगाथायें सुनी जाती हैं जिन्होंने राष्ट्र पर संकट आने पर हँसते-हँसते प्राणों की बाजी लगा दी। लोग उनकी मूर्तियों पर पुष्प अर्पित कर अपने भाग्य को धन्य मानते हैं।
आज युद्ध का दृश्य बदल गया है। जनता पर होने वाले अत्याचार, अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने वाले और आततायी को चुनौती देने वाले जननायक भी किसी प्राचीन शूरवीर योद्धा से कम नहीं हैं। लोग उनके आह्वान पर सर्वस्व त्याग करने को संनद्ध हो जाते हैं। अधिकांश में ये गुण जन्मजात ही होते हैं। इनके अभाव में कई बार जनता का नेतृत्व करने वाले अपने उद्देश्य से भटक भी जाते हैं।
- यश की इच्छा – जिसके गुण गौरव की गाथा का गान लोग मुक्तकण्ठ से करें ऐसा व्यक्ति सचमुच में ही सौभाग्यशाली है। मान ही महापुरुषों का धन है। अपनी आन-बान-शान में वे अपने जीवन की आहुति भी हँसते-हँसते दे देते हैं। महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी का नाम सुन कर आज भी आर्य जाति का सीना तन जाता है। देश के लिये बलिदान होने वाले पं. रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, अमर शहीद भगतसिंह आज भी अमर हैं।
- स्वाध्याय में रुचि – जीवन को उन्नत करने वाले ग्रन्थ-वेद, शास्त्र, दर्शन, उपनिषद्, गीतादि का स्वाध्याय एवं आध्यात्मिक ग्रन्थों का स्वाध्याय आत्मिक शान्ति को देने वाला है। कुछ लोगों में इसे करने की रुचि देखी जाती है तथा कुछ अभ्यास द्वारा इसका विकास कर लेते हैं।
जैसा कि पहले कहा जा चुका है-उपरोक्त गुण कुछ व्यक्तियों में जन्मजात ही होते हैं और कुछ लोग पुरुषार्थ द्वारा इनको प्राप्त करते हैं। जिनमें जन्म से ही ये गुण हों उन्होंने पूर्वजन्मों में इनके लिये पुरुषार्थ किया था यह मानना चाहिये। अच्छे व्यक्तित्व के लिये इनका होना बहुत ही आवश्यक है।
इनके अतिरिक्त समुन्नत कद काठी, दृढ़ संकल्प, उदार हृदय, नेतृत्व की योग्यता, सामाजिकता, संयम आदि अनेक गुण व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखार देते हैं।
साभार – स्वामी देवव्रत सरस्वती जी








