व्रत पालकों के सखा

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विष्णोर्नु क॑ वी॒र्याणि प्र वर्वोचं यः पार्थिवानि विमुमे रजांसि ।

यो अस्क॑भाय्युत्तरं स॒धस्य॑ स॒धस्य॑ विचक्रमा॒णस्त्रेधोरु॑णा॒यः

॥ ऋः १.२२.१६

तर्जः मोली मोली कातिरुन्दर कड़ी कुरमग

कोटी-कोटी धन्यवाद तुझे प्रीतम
साथ तू सभी के रहे जनम जनम
सारे जगत का हितैषी सखा
निःस्वार्थ न्याय युक्त, सर्वहितकारी प्रभु,
परिपूर्ण नियमबद्ध तेरा शासन (2)
॥कोटि कोटि ॥

सब जीवों का सर्वदा और सर्वत्र
सच्चा साथी है और सच्चा ही मित्र
तेरी कृपा से अहिंसा अस्तेय,
ब्रह्मचर्य और सत्य का लेते हैं व्रत (2)
॥ कोटि कोटि ॥

जुड़वाँ सखा ही है सारे जीवों का तू
ऐसा सखा तो जगत में नहीं
अन्य जो मित्र हैं अस्थायी अस्थिर हैं
स्वार्थ के वश हैं कहीं ना कहीं (2)
॥कोटि कोटि॥

दिव्य व्यवस्था प्रभु की निहारें जो
मुग्ध वो इन्द्र पे होवे ना क्यों?
प्रीतम सखा के प्रति हो आवर्जित
उसको बसाये हृदय में ना क्यों? (2)
॥ कोटि कोटि ॥

अब तो व्रतों का परिपूर्ण पालन
भक्त-हृदय में समाये सहज
सत्य अहिंसादि व्रत के पालन की ही
जीवन की बगिया में छाये महक ॥
॥कोटि कोटि॥

(आवर्जित) त्यक्त छोड़ा हुआ।