🔥 अमर क्रांतिकारी विष्णु गणेश पिंगले: स्वतंत्रता संग्राम के वीर योद्धा 🇮🇳
🎯 जन्म और प्रारंभिक जीवन
१८८८ में महाराष्ट्र के पुणे जनपद में जन्मे अमर क्रांतिकारी विष्णु गणेश पिंगले ९ भाई-बहनों में सबसे छोटे थे और परिवार के अत्यंत दुलारे थे ❤️। विद्यालयी जीवन में ही वे राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव में आ गए और स्वतंत्रता वीर सावरकर के साथ बढ़-चढ़कर भाग लिया ✊।
🚀 क्रांतिकारी चेतना का जागरण
मुंबई में रहकर उन्होंने अनेक राष्ट्रवादियों से संपर्क किया और यहीं उन्होंने विस्फोटकों पर काम करना सीखा 💣। उनकी इंजीनियर बनने की इच्छा थी, जिसके चलते वे अमेरिका गए और १९१२ में वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की 📚।
🔥 ग़दर पार्टी से जुड़ाव और क्रांतिकारी योजना
शीघ्र ही वे ग़दर पार्टी से जुड़ गए और इसके सक्रिय सदस्य बन गए 🇮🇳। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों की व्यस्तता का लाभ उठाकर ग़दर पार्टी ने ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई 🚩। १९१४ में वे कलकत्ता पहुंचे, जहाँ वे रासबिहारी बोस से मिले और क्रांति की रणनीति पर चर्चा की 🤝।
⚔ ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह
पिंगले ने यूपी और पंजाब में क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित किया और भारतीय सैनिकों को इस विद्रोह में शामिल करने की योजना बनाई 🏇। परंतु, दुर्भाग्यवश एक ब्रिटिश पुलिस का जासूस इस आंदोलन की गुप्त जानकारी अंग्रेजों तक पहुंचा रहा था 🕵♂।
⛓ गिरफ्तारी और अंतिम संघर्ष
जब योजना अपने अंतिम चरण में थी, अंग्रेजी हुकूमत ने क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया 🚔। इसके बावजूद, पिंगले और सराबा जैसे रणबांकुरों ने मेरठ छावनी में विद्रोह भड़काने का प्रयास किया 🏹। परंतु यह भी असफल रहा और पिंगले पुलिस के हाथ लग गए 😞।
⚖ लाहौर षड्यंत्र केस और फांसी
१९१५ में लाहौर षड्यंत्र केस के अंतर्गत मुकदमा चला ⚖ और १६ नवंबर १९१५ को लाहौर सेंट्रल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई ⚰। उन्होंने हंसते-हंसते माँ भारती के चरणों में अपने प्राण न्योछावर कर दिए 🇮🇳💔।
🙏 महान हुतात्मा को शत-शत नमन
विष्णु गणेश पिंगले का बलिदान हमेशा प्रेरणा स्रोत बना रहेगा 🙌। उन्होंने देश की आज़ादी के लिए जो समर्पण और शौर्य दिखाया, वह स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा ✍🔥।
🇮🇳 “जय हिंद! वंदे मातरम्!” 🇮🇳
विस्तृत जीवन परिचय

१८८८ में महाराष्ट्र के पुणे जनपद में जनपद में जन्मे अमर क्रांतिकारी विष्णु गणेश पिंगले ९ भाई बहनों में सबसे छोटे एवं सभी के दुलारे थे| विद्यालयी जीवन में ही वे राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रभाव में आ गए और स्वतंत्र्य वीर सावरकर के साथ बढ़ चढ़ कर इनमे भाग लिया|
इस समय पर पढ़े प्रभाव ने पिंगले पर अमिट छाप छोड़ी और बाद में जब वे मुंबई गए तो अनेकों राष्ट्रवादियों से उनका परिचय हुआ और यहीं उन्होंने विस्फोटकों पर काम करना सीखा| चूँकि उनकी इच्छा इंजीनियर बनाने की थी अतः इस उद्देश्य से वे अमेरिका गए और १९१२ में वाशिंगटन यूनिवर्सटी में मेकैनिकल इंजीनियर की पढाई के लिए प्रवेश लिया|
शीघ्र ही वे ग़दर पार्टी के संपर्क में आ गए और उसके सक्रिय सदस्यों में गिने जाने लगे| प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों को फँसा देख इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए ग़दर पार्टी ने भारत के क्रांतिकारियों से संपर्क कर विदेश सत्ता को उखाड़ फेंकने हेतु योजना पर काम करना शुरू किया और इस हेतु ग़दर पार्टी के कई वरिष्ठ लोग जिनमें करतार सिंह सराबा, पिंगले, सत्येन सेन आदि शामिल हैं, १९१४ में कलकत्ता पहुंचे|
पिंगले प्रमुख क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से बनारस में मिले और उनके साथ आगे की योजना पर चर्चा की| इस दौरान पिंगले ने यू.पी. एवं पंजाब में घनघोर काम किया और और कई अन्य साथियों के साथ मिलकर सशस्त्र विद्रोह का पूरा खाका तैयार किया जिसमें भारतीय सैनिकों के भी शामिल होने की पूरी आशा एवं तैय्यारी थी| पर दुर्भाग्य, ब्रिटिश पुलिस का एक भारतीय सिपाही इस पूरे दौर में क्रांतिकारी के रूप में खुद को प्रदर्शित करता हुआ, सारे घटनाक्रम का गवाह रहा और जब ये योजना पूरे परवान पर थी, उसकी मदद से सरकार ने इस पूरे आन्दोलन का शुरू होने से पहले ही कुचल डाला|
अधिकांश प्रमुख नेता पकड़े गए परन्तु सराबा और पिंगले जैसे रण बांकुरों ने अंतिम दम तक हार ना मानने की भारतीय परंपरा का निर्वाह करते हुए मेरठ छावनी में विद्रोह भड़काने का प्रयास किया| इस प्रयास में भी असफल पिंगले मेरठ में पुलिस के हाथ पड़ गए और सराबा लाहौर पुलिस के हाथ|
अन्य कई साथियों के साथ पिंगले पर भी लाहौर षड़यंत्र केस के नाम से अप्रैल १९१५ में मुकदमा चलाया गया और जैसा कि सबको पता था कि क्या होना है, १६ नवम्बर १९१५ को उन्हें लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दे दी गयी और इस तरह माँ भारती की कोख से जन्मा उसका ये वीर पुत्र माँ की गोद में ही सो गया| महान हुतात्मा को कोटिशः नमन|
साभार___विशाल अग्रवाल










