✨ अंग्रेजों के विरुद्ध अदम्य संघर्ष का प्रतीक ✨
23 जनवरी को जब हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मनाते हैं, उसी दिन एक और महान क्रांतिवीर, वीर सुरेन्द्र साईं का जन्म भी हुआ था! 🎉🔥
🏹 वीर सुरेन्द्र साईं का जन्म और वंश
वीर सुरेन्द्र साईं का जन्म 23 जनवरी 1809 में उड़ीसा के संबलपुर से 40 किमी उत्तर में स्थित खिंडा गांव में हुआ था। 🏡 उनका परिवार चौहान वंश से संबंधित था, और वे संबलपुर के चतुर्थ चौहान राजा मधुकर साईं के वंशज थे। ✨
जब 1827 में संबलपुर के तत्कालीन राजा महाराजा साईं का निःसंतान निधन हुआ, तो स्वाभाविक रूप से वीर सुरेन्द्र साईं उत्तराधिकारी थे, लेकिन अंग्रेजों ने कुटिल चाल चलते हुए पहले महाराज साईं की पत्नी और फिर एक दासी पुत्र नारायण सिंह को राजा बना दिया। 😠⚡ इससे सुरेन्द्र साईं और उनके समर्थकों में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी! 🔥⚔️
🚨 विद्रोह और अंग्रेजों से संघर्ष
वीर सुरेन्द्र साईं ने संबलपुर में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया। 🎺⚡ परंतु अंग्रेजों ने उन्हें और उनके भाई उदयंत साईं तथा चाचा बलराम सिंह को पकड़कर हजारीबाग जेल में डाल दिया। 😡🔗 वहां बलराम सिंह की मृत्यु हो गई, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था!
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब सैनिकों ने जेल पर हमला किया, तो वीर सुरेन्द्र साईं और उनके साथी मुक्त हो गए! 🚀🏹 वे सीधे संबलपुर लौटे और अंग्रेजों के खिलाफ अपने संघर्ष को फिर से तेज कर दिया। ✊🔥
⛰️ पहाड़ों से छेड़ी गई क्रांति
वीर सुरेन्द्र साईं ने संबलपुर के आदिवासियों और पददलित वर्गों को एकजुट किया और अपनी क्रांति को पश्चिमी उड़ीसा के पहाड़ी इलाकों में फैला दिया। 🌲🔥 1827 से 1862 तक उनका संघर्ष निरंतर चलता रहा, और अंग्रेजों को बार-बार करारी हार का सामना करना पड़ा! ⚔️💪
🎭 अंग्रेजों का छल और विश्वासघात
जब अंग्रेज़ उनकी वीरता से पराजित और हताश हो गए, तो उन्होंने शांति और समझौते का प्रस्ताव रखा। 🏳️ मेजर इम्पी ने कसम खाई कि अगर सुरेन्द्र साईं आत्मसमर्पण कर दें, तो उन्हें सम्मानजनक व्यवहार मिलेगा।
लेकिन जैसे ही मेजर इम्पी की मृत्यु हुई, अंग्रेजों ने अपना छलावा दिखा दिया! 😡💔 वीर सुरेन्द्र साईं को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और इस बार उन्हें अपनी मातृभूमि से दूर असीरगढ़ किले की जेल में डाल दिया गया। 🏰🔗
⚰️ वीरगति और भूली हुई विरासत
अपनी मातृभूमि से कोसों दूर, 20 वर्षों तक जेल में रहने के बाद, 23 मई 1884 को वीर सुरेन्द्र साईं ने असीरगढ़ किले में अंतिम सांस ली। 😢💐
पश्चिमी उड़ीसा में आज भी वीर सुरेन्द्र साईं को भगवान जैसा सम्मान प्राप्त है। 🙏🏼❤️ वहां के लोकगीतों में उनके बलिदान और उनके साथियों का गुणगान किया जाता है, जो या तो फांसी पर झूल गए या फिर अंडमान की सेल्युलर जेल में अपना जीवन बलिदान कर गए। 😔⚔️
🇮🇳 हमारा कर्तव्य: वीर सुरेन्द्र साईं को याद रखना!
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे इतिहास में इतने महान क्रांतिकारी भुला दिए गए! 😞💔 सरकारों ने उनके योगदान को वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। लेकिन यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम ऐसे वीरों को याद रखें, उनकी गाथा सुनाएं और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करें! 💪🔥
🙏 वीर सुरेन्द्र साईं को कोटि-कोटि नमन! 🙏
🌿⚔️ जय हिंद! वंदे मातरम्! 🇮🇳🔥
विस्तृत जीवन परिचय

23 जनवरी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिवस के साथ साथ एक और क्रांतिवीर का जन्मदिवस भी है, वीर सुरेन्द्र साईं का जिनका जन्म 23 जनवरी 1809 में उडीसा के संबलपुर से 40 किलोमीटर उत्तर में खिंडा नामक गाँव में धर्मसिंह के यहाँ हुआ था। वो संबलपुर के चतुर्थ चौहान राजा मधुकर साईं के वंशज थे और इस कारण 1827 में वहां के राजा महाराजा साईं की निस्संतान मृत्यु के बाद सिंहासन के उत्तराधिकारी थे।
परन्तु अंग्रेजों ने कुटिलता से सुरेन्द्र साईं के अधिकार को दरकिनार करते हुए पहले महाराज साईं की पत्नी और उसके असफल होने पर दासी से उत्पन्न नारायण सिंह को शासन का भार सौंपा जिसने सुरेन्द्र साईं और उनके समर्थकों के मन में विद्रोह का बीज अंकुरित कर दिया।
विद्रोह का बिगुल बजते ही अंग्रेजों ने सुरेन्द्र साईं, उनके भाई उदयन्त साईं और चाचा बलराम सिंह को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में डाल दिया जहाँ कुछ समय बाद बलराम सिंह की मृत्य हो गयी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के शुरू होते ही सिपाहियों ने सुरेन्द्र साईं को उनके भाई सहित मुक्त कर दिया और वो संबलपुर पहुंचकर अपने समर्थकों के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति में शामिल हो गए।
उन्होंने पददलित और आदिवासी लोगों को अंग्रेजों और अभिजात्य भारतीयों के विरुद्ध संगठित किया और 1827 में 18 वर्ष की आयु में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रारम्भ किये अपने अभियान को 1857 में पश्चिमी उडीसा के पहाड़ी इलाकों में पहुंचा दिया, जो 1862 में उनके आत्मसमर्पण तक अनवरत चला।
हालांकि और स्थानों पर अंग्रेजों ने 1858 तक स्थिति पर नियंत्रण कर लिया था पर संबलपुर में वीर सुरेन्द्र साईं के सामने उन्हें नाकों चने चबाने पड़े और उनकी हर चाल नाकामयाब रही।
बरसों का संघर्ष भी जब इस लड़ाई को कुचल नहीं पाया तो अंग्रेजी सेना के सेनापति मेजर इम्पी को समझ आया कि लड़ाई में यहाँ जीतना उसके लिए मुश्किल है, इसलिए उसने शांति और बातचीत का रास्ता अपनाया और उसकी बातों पर भरोसा कर उस सेनानी ने जिसे कोई ताकत कभी झुका नहीं पायी, आत्मसमर्पण कर दिया पर इम्पी के मृत्यु होते ही अंग्रेजी प्रशासन ने अपने सारे वादे भुला दिए और वीर सुरेन्द्र साईं के साथ दुश्मन वाला सलूक करना शुरू कर दिया।
पहले ही 17 वर्ष जेलों में बिता चुका ये सेनानी इस समर्पण के बाद फिर से 20 वर्षों के लिए जेल भेज दिया गया। अपनी मातृभूमि से बहुत दूर असीरगढ़ किले की जेल में वीर सुरेन्द्र साईं की 23 मई 1884 को मृत्यु हो गयी। पश्चिमी उडीसा में वीर सुरेन्द्र साईं को भगवान का सा दर्जा दिया जाता है और लोग उन्हें और उनके उन तमाम साथियों को जो या तो फांसी के फंदे पर झूल गए और या अंडमान की सेल्युलर जेल में जीवन होम कर गए, लोकगीतों में याद करते हैं। पर दुर्भाग्यवश सरकारों ने उनके बारे में कोई सुध नहीं ली और अन्य अनेकों क्रांतिकारियों की भांति वीर सुरेन्द्र साईं का बलिदान भी बिसरा दिया गया। शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।
साभार__विशाल अग्रवाल










