वीर शहीद सुमेरसिंह

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नयाबास का आर्यवीर

हिन्दी सत्याग्रह में अनेक प्रकार के अत्याचार हुये। नयाबास आर्यसमाजियों का एक प्रसिद्ध धार्मिक ग्राम है। वहां से एक जल्या ब्र० सुमेरसिह, जिसमें नेष्ठिक ब्रह्माचारी बलदेव भी थे, ने सत्याग्रहार्थ चण्डीगढ़ में सत्याग्रह किया और गिरफ्तार होकर फिरोजपुर जेल में भेज दिये गये।


जेल का लाठीचार्ज

२४ अगस्त को जेल में भयंकर लाठी चार्ज हुआ। सभी सत्याग्रहियों ने लाठियों की मार खाई। 19 सत्याग्रही ऐसे थे जिनकी हड्डियां टूट गई और वे अपाहिज हो गये। इसी दिन नयावास (रोहतक) का वीर सुमेरसिह वीरगति को प्राप्त हुआ अर्थात् शहीद हो गया। वह शान्त प्रकृति का युवक था और निश्चिन्त होकर सत्यार्थप्रकाश का स्वाध्याय कर रहा था।


निर्दय अत्याचार

अत्याचारी जेल अधिकारियों ने अकस्मात् उस पर आक्रमण करके लाठियों से मार-मार कर उसके प्राण निकाल दिये। उसने आह तक न की। जस्टिस कपूर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा—
“इस प्रकार का अत्याचार न पहले कभी हुआ और न कभी आगे होगा। न भूतो न भविष्यति।”


पारिवारिक परिचय

श्री सुमेरसिह के पिता का नाम म० प्रभुदयाल था। माता भी जीवित थीं। इसके भाई मेहरसिह, लच्छमनसिह आदि थे। यह एक साधारण कृषक परिवार था।


शहादत की सूचना

सुमेरसिंह की शहीद होने की सूचना २४ अगस्त को ही सारे हरयाणे में फैल गई। सार्वदेशिक सभा ने प्रयास किया कि शहीद का मृत शरीर अन्त्येष्टि हेतु नयाबास लाया जाये।


पुलिस का पहरा

किन्तु ग्राम नयाबास के चारों ओर पुलिस का घेरा था। किसी बाहर के व्यक्ति को अन्दर नहीं जाने देते थे। टांडाहेड़ी का दुष्ट रामसिंह पुलिस इंचार्ज था। शराब और सिगरेट के नशे में वह नवाब की तरह सभी को धमकाता था।


शव की वापसी

शहीद सुमेरसिंह का शव पुलिस गाड़ी में रखा गया। लकड़ी और मिट्टी के तेल के पीपे भी साथ थे। पुलिस चाहती थी कि रात को ही शव जला दिया जाये। किन्तु ग्रामवासी और पिता ने इनकार किया कि हमारे धर्म में रात में अन्त्येष्टि नहीं होती।


महासिंह वर्मा का आगमन

इसी समय पं० महासिंह वर्मा रोहतक से चोरी-छिपे गाँव में पहुँच गये। उनके उत्साहवर्धन से ग्रामवासी और दृढ़ हो गये। उन्होंने साफ इनकार कर दिया कि रात को अन्त्येष्टि नहीं होगी।


स्वामी अभेदानन्द की निर्भीकता

स्वामी अभेदानन्द जी महाराज सामग्री की बोरी लेकर पहुँचे। पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु जब उन्होंने अंग्रेज़ी में धूर्त रामसिंह को फटकारा तो उसकी बोलती बन्द हो गई। स्वामी जी ने कहा—
“सभी सत्याग्रही मेरे पुत्र हैं। हमारे पुत्र को लाठियां मार-मार कर प्राण भी लो और हमें उसका अन्त्येष्टि संस्कार भी न करने दो!”


अन्त्येष्टि संस्कार

ग्रामवासियों और स्वामी अभेदानन्द जी की दृढ़ता से पुलिस ने विवश होकर शव परिवार को सौंपा। प्रातः सूर्योदय के पश्चात् स्वामी अभेदानन्द जी और पं० महासिंह वर्मा की देखरेख में वैदिक रीति से अन्त्येष्टि सम्पन्न हुई।


ग्राम का शोक

नयाबास ग्राम शोकाकुल था। इस युवक ने विवाह से इनकार कर ब्रह्मचर्य से आर्यसमाज और देश सेवा का संकल्प लिया था। माता-पिता और संबंधी विलाप कर रहे थे। पूरे गाँव में किसी घर में उस दिन चूल्हा नहीं जला।


बलिदान का प्रभाव

इस वीर ब्रह्मचारी के बलिदान से नयाबास ही नहीं, पूरे हरयाणे में वज्रपात हुआ। शहादत से अपूर्व जोश की अग्नि भड़की। भाई मेहरसिंह भी अपना जत्था लेकर सत्याग्रह करने जेल चला गया।


आन्दोलन की तेज़ी

२४ अगस्त के पश्चात् यह हिन्दी सत्याग्रह आन्दोलन ३१ दिसम्बर १९५७ तक निरंतर चलता रहा। उत्साह में कोई कमी नहीं आई। हरियाणा ने अन्त तक अपनी पूरी शक्ति लगाकर जूझना जारी रखा और सिद्ध कर दिया कि हरियाणे के वीर सिर कटवा सकते हैं पर अन्याय के आगे झुक नहीं सकते।