वीर रामचन्द्र खजाञ्ची

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वीर रामचन्द्र खजाञ्ची – एक प्रेरणादायी जीवन परिचय

नाम: रामचन्द्र खजाञ्ची
जन्म: १६ आषाढ़ संवत् १९५३ (जुलाई १८९६ ई.), जिला कठुवा, तहसील हीरानगर, जम्मू रियासत
मृत्यु: ८ माघ १६७६ वि॰ (२० जनवरी १९२३ ई.), बटौहड़ा, जम्मू


परिचय

वीर रामचन्द्र खजाञ्ची एक ऐसे निर्भीक आर्य समाजी कार्यकर्ता थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सामाजिक सुधार, विशेषकर अछूत कहे जाने वाले मेघ समुदाय के उद्धार हेतु समर्पित कर दिया। वे ना केवल एक सच्चे देशभक्त थे बल्कि आर्य समाज के उद्देश्यों के दृढ़ प्रचारक भी थे। मात्र २६ वर्ष की अल्पायु में वे समाजसेवा, शिक्षा, धार्मिक सुधार और जातीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।


शिक्षा और प्रारंभिक जीवन

रामचन्द्र जी का जन्म ला० खोजूशाह महाजन के घर हुआ था। वे आठ भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े थे। उन्होंने मिडिल तक शिक्षा प्राप्त की और सदैव अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करते थे। जब रियासत की भाषा डोगरी से उर्दू में परिवर्तित हुई तो उनके पिता की जगह उन्हें खजाञ्ची की नौकरी मिली।


धार्मिक प्रवृत्ति और आर्य समाज से जुड़ाव

बचपन से ही वे धार्मिक स्वभाव के थे और समाचार पत्रों में गहरी रुचि रखते थे। आर्य समाज की सत्संगति ने उनके जीवन को एक स्पष्ट दिशा दी। बसोहली और कठुवा जैसे स्थानों में उन्होंने आर्य समाज की सेवा की। उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध शुद्धि अभियान भी चलाया, जिससे समाज के कट्टरपंथियों की ओर से उन्हें भारी विरोध झेलना पड़ा।


मेघ समुदाय के लिए संघर्ष

अखनूर में उनकी नियुक्ति के बाद उन्होंने वहां के उपेक्षित मेघ समुदाय के उत्थान का संकल्प लिया। उन्होंने उनके लिए अलग पाठशाला स्थापित की, उनके दुःख-दर्द में सम्मिलित हुए, और उन्हें आत्मसम्मान का भाव सिखाया। जब यह सहन न कर सकने योग्य बन गया, तो हिन्दू-मुस्लिम कट्टरपंथियों ने उनका बहिष्कार शुरू किया। फिर भी उन्होंने अपने लक्ष्य से पीछे हटने से इनकार कर दिया।


बलिदान

३१ दिसम्बर १९२२ को जब वे बटौहड़ा में पाठशाला खोलने के उद्देश्य से पहुंचे, तो उनका विरोध हुआ। उन्होंने २ माघ १६७६ वि॰ (४ जनवरी १९२३) को पुनः पाठशाला प्रारम्भ करने का निश्चय किया। उसी दिन एक योजनाबद्ध षड्यंत्र में राजपूतों और मुसलमान गुर्जरों द्वारा उन पर हमला कर दिया गया। कई लाठियों और हथियारों के प्रहार से घायल होकर वे छह दिन तक बेहोश रहे और अंततः २० जनवरी १९२३ को स्वर्ग सिधार गए।


स्मृति और प्रेरणा

उनकी स्मृति में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब ने “रामचन्द्र स्मारक” की स्थापना की, जिसके चार उद्देश्य निर्धारित किए गए:

  1. अछूतों की सामाजिक उन्नति
  2. निःशुल्क शिक्षा
  3. धर्मप्रचार
  4. आत्मसम्मान का विकास

आज भी जम्मू में प्रतिवर्ष एक मेला आयोजित होता है, जहां उनका स्मारक, बगीचा और कुआँ उनकी बलिदानगाथा की याद दिलाते हैं।


निष्कर्ष

रामचन्द्र खजाञ्ची एक युगपुरुष थे जिन्होंने जात-पात, छुआछूत और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध जंग लड़ी। वेदों की ज्योति, समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी। उनका जीवन आज भी प्रत्येक आर्य, समाजसेवी और देशभक्त के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

NOTE-उपर्युक्त चित्र राम चंद्र खजांची जी का असली चित्र नहीं है। यह A.I द्वारा बनाया गया है। दुर्भाग्य है देश का की ,हमारे पास ऐसे क्रांतिकारियों का असली चित्र भी नहीं है।