वीर दुर्गादास राठौड़:

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मारवाड़ के स्वाभिमान की अमर गाथा 🚩🔥

“माई ऐहड़ौ पूत जण, जेहड़ौ दुर्गादास,
मार गण्डासे थामियो, बिन थाम्बा आकास।”

आज वीर दुर्गादास राठौड़ जी का निर्वाण दिवस है, जो न केवल मारवाड़ की आन-बान और शान के प्रतीक थे, बल्कि राजपूत वीरता की ज्वलंत मिसाल भी हैं। 🙏🏻✨


🔥 जन्म और बचपन 🔥

⚔️ जन्म: 13 अगस्त 1638, ग्राम सालवा (मारवाड़)
👨‍👩‍👦 पिता: जोधपुर राज्य के दीवान श्री आसकरण
👩 माता: नेतकंवर

दुर्गादास का पालन-पोषण उनकी वीर माता नेतकंवर ने किया। जैसे छत्रपति शिवाजी को उनकी माता जीजाबाई ने संस्कारित किया था, वैसे ही दुर्गादास को भी उनकी माँ ने पराक्रम, देशभक्ति और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया। 💪🏼🔥


⚔️ राजभक्ति और वीरता ⚔️

जब दुर्गादास 15 वर्ष के थे, उनके पिता आसकरण धोखे से मारे गए। परंतु उन्होंने अपने साहस और निष्ठा से जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह (प्रथम) का विश्वास जीत लिया। जसवंत सिंह ने उन्हें “मारवाड़ का भावी रक्षक” कहा, लेकिन दुर्गादास स्वयं को हमेशा मारवाड़ की गद्दी का सेवक मानते रहे। 🙌🏼✨

एक बार, राजा के प्रिय दरबारी राईके ने कुछ उद्दंडता की, जिसे सहन न करते हुए दुर्गादास ने सबके सामने उसे कठोर दंड दिया। यह देखकर राजा ने उन्हें अपनी सेवा में रख लिया और अपने साथ अभियानों में ले जाने लगे।


⚔️ औरंगजेब के षड्यंत्र और दुर्गादास का संघर्ष ⚔️

🔹 मुगल बादशाह औरंगजेब की नज़र जोधपुर पर थी, इसलिए उसने जसवंत सिंह को अफगानिस्तान में पठान विद्रोहियों से लड़ने भेजा।
🔹 जसवंत सिंह की मृत्यु (नवंबर 1678) के बाद औरंगजेब ने जोधपुर पर कब्ज़ा कर लिया।
🔹 इस दौरान जसवंत सिंह की पत्नी आदम जी ने एक पुत्र को जन्म दिया – अजीत सिंह।
🔹 औरंगजेब ने अजीत सिंह को दिल्ली बुलाकर या तो मुसलमान बनाने या हत्या करने की योजना बनाई।

लेकिन यहाँ आया राजपूती शौर्य का अद्भुत पल! 🔥


⚡ अजीत सिंह को बचाने की अद्भुत योजना ⚡

जब मुगल सैनिकों ने अजीत सिंह के आवास को घेर लिया, तो उनकी धाय गोरा टांक ने पन्ना धाय की तरह अपने पुत्र को वहीं छोड़ दिया और अजीत सिंह को सुरक्षित निकाल लिया। 🚀

⚔️ दुर्गादास ने मुगलों पर धावा बोलकर घेरा तोड़ दिया और अजीत सिंह को सिरोही के कालिंदी गाँव में सुरक्षित रख दिया।
⚔️ अजीत सिंह की रक्षा के लिए मुकुंददास खींची को साधु वेश में नियुक्त कर दिया।

जब औरंगजेब को इस योजना की जानकारी मिली, तो उसने गुस्से में आकर मारवाड़ में दमन चक्र चला दिया। लेकिन वीर दुर्गादास ने अपनी छापामार शैली से मुगलों के दांत खट्टे कर दिए। 💪🏼🔥


⚔️ 30 वर्षों तक मुगलों से संघर्ष ⚔️

📌 दुर्गादास ने मेवाड़ के महाराणा राज सिंह और मराठाओं का साथ लेने की कोशिश की।
📌 उन्होंने औरंगजेब के छोटे पुत्र अकबर को अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह के लिए तैयार किया, लेकिन यह योजना पूरी नहीं हो पाई।
📌 वे लगातार छापामार युद्ध करते रहे और मुगलों को कमजोर करते रहे।

👉 आखिरकार, 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद दुर्गादास के प्रयास सफल हुए!

🚩 20 मार्च 1707 को अजीत सिंह ने जोधपुर के किले में धूमधाम से प्रवेश किया और राजगद्दी संभाली।


🙏 वीर दुर्गादास का अंतिम समय 🙏

अजीत सिंह ने उन्हें जोधपुर की रियासत में प्रधान पद देने की पेशकश की, लेकिन विनम्र दुर्गादास ने इसे ठुकरा दिया।

⚔️ वे उज्जैन के पास सादड़ी चले गए और 22 नवंबर 1718 को शिप्रा नदी के तट पर उनका स्वर्गवास हुआ।


🔥 वीर दुर्गादास राठौड़ को शत-शत नमन 🔥

आज भी उनका बलिदान हमें सिखाता है कि धर्म, स्वाभिमान और मातृभूमि के लिए सब कुछ न्योछावर किया जा सकता है। 💪🏼🚩

💐 वीर दुर्गादास राठौड़ अमर रहें! 💐

अपनी जन्मभूमि मारवाड़ को मुगलों के आधिपत्य से मुक्त कराने वाले वीर दुर्गादास राठौड़ का आज निर्वाण दिवस है। उनका जन्म जन्म 13 अगस्त, 1638 को ग्राम सालवा में हुआ था।

उनके पिता जोधपुर राज्य के दीवान श्री आसकरण तथा माता नेतकँवर थीं। आसकरण की अन्य पत्नियाँ नेतकँवर से जलती थीं। अतः मजबूर होकर आसकरण ने उसे सालवा के पास लूणवा गाँव में रखवा दिया। छत्रपति शिवाजी की तरह दुर्गादास का लालन-पालन उनकी माता ने ही किया। उन्होंने दुर्गादास में वीरता के साथ-साथ देश और धर्म पर मर-मिटने के संस्कार डाले।

आसकरण जी उज्जैन की लड़ाई में धोखे से मारे गये। उस समय दुर्गादास केवल पंद्रह वर्ष के थे पर ऐसे होनहार थे कि मारवाड़ के तत्कालीन राजा जसवन्त सिंह (प्रथम) अपने बड़े बेटे पृथ्वीसिंह की तरह इन्हें भी प्यार करने लगे।

एक बार महाराज के एक मुँहलगे दरबारी राईके ने कुछ उद्दण्डता की। दुर्गादास से सहा नहीं गया। उसने सबके सामने राईके को कठोर दण्ड दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें निजी सेवा में रख लिया और अपने साथ अभियानों में ले जाने लगे। एक बार उन्होंने दुर्गादास को ‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ कहा; पर वीर दुर्गादास सदा स्वयं को मारवाड़ की गद्दी का सेवक ही मानते थे।

कुछ दिनों बाद जब महाराज दक्खिन की सूबेदारी पर गये, तो पृथ्वीसिंह को राज्य का भार सौंपा और वीर दुर्गादास को सेनापति बनाकर अपने साथ कर लिया। उस समय दक्खिन में महाराज शिवाजी का साम्राज्य था।मुग़लों की उनके सामने एक न चलती थी; इसलिए औरंगजेब ने जसवन्तसिंह को भेजा था।

जसवन्तसिंह के पहुंचते ही मार-काट बन्द हो गई। धीरे-धीरे शिवाजी और जसवन्तसिंह में मेल-जोल हो गया। औरंगजेब की इच्छा तो थी कि शिवाजी को परास्त किया जाये। यह इरादा पूरा न हुआ, तो उसने जसवन्तसिंह को वहां से हटा दिया, और कुछ दिनों उन्हें लाहौर में रखकर फिर काबुल भेज दिया। काबुल के मुसलमान इतनी आसानी से दबने वाले नहीं थे। भीषण संग्राम हुआ; जिसमें महाराजा के दो बेटे मारे गये। बुढ़ापे में जसवन्तसिंह को यह गहरी चोट लगी। बहुत दु:खी होकर वहां से पेशावर चले गये।

औरंगजेब की कुदृष्टि मारवाड़ के विशाल राज्य पर थी और इसीलिये उसने षड्यन्त्रपूर्वक जसवन्त सिंह को अफगानिस्तान में पठान विद्रोहियों से लड़ने भेजा था। इस अभियान के दौरान नवम्बर 1678 में जमरूद में उनकी मृत्यु हो गयी। इसी बीच उनकी रानी आदम जी ने पेशावर में एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम अजीत सिंह रखा गया। जसवन्त सिंह के मरते ही औरंगजेब ने जोधपुर रियासत पर कब्जा कर वहाँ शाही हाकिम बैठा दिया। उसने अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा घोषित करने के बहाने दिल्ली बुलाया। वस्तुतः वह उसे मुसलमान बनाना या मारना चाहता था।

इस कठिन घड़ी में दुर्गादास अजीत सिंह के साथ दिल्ली पहुंचे। एक दिन अचानक मुगल सैनिकों ने अजीत सिंह के आवास को घेर लिया। अजीत सिंह की धाय गोरा टांक ने पन्ना धाय की तरह अपने पुत्र को वहां छोड़ दिया और उन्हें लेकर गुप्त मार्ग से बाहर निकल गयी। उधर दुर्गादास ने हमला कर घेरा तोड़ दिया और वे भी जोधपुर की ओर निकल गये। उन्होेंने अजीत सिंह को सिरोही के पास कालिन्दी गाँव में पुरोहित जयदेव के घर रखवा कर मुकुनदास खीची को साधु वेश में उनकी रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया। कई दिन बाद औरंगजेब को जब वास्तविकता पता लगी, तो उसने बालक की हत्या कर दी।

अब दुर्गादास मारवाड़ के सामन्तों के साथ छापामार शैली में मुगल सेनाओं पर हमले करने लगे। उन्होंने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह तथा मराठों को भी जोड़ना चाहा; पर इसमें उन्हें पूरी सफलता नहीं मिली। उन्होंने औरंगजेब के छोटे पुत्र अकबर को राजा बनाने का लालच देकर अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह के लिए तैयार किया; पर दुर्भाग्यवश यह योजना भी पूरी नहीं हो पायी।

अगले 30 साल तक वीर दुर्गादास इसी काम में लगे रहे। औरंगजेब की मृत्यु के बाद उनके प्रयास सफल हुए। 20 मार्च, 1707 को महाराजा अजीत सिंह ने धूमधाम से जोधपुर दुर्ग में प्रवेश किया। वे जानते थे कि इसका श्रेय दुर्गादास को है, अतः उन्होंने दुर्गादास से रियासत का प्रधान पद स्वीकार करने को कहा; पर दुर्गादास ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उनकी अवस्था भी अब इस योग्य नहीं थी। अतः वे अजीतसिंह की अनुमति लेकर उज्जैन के पास सादड़ी चले गये। इस प्रकार उन्होंने महाराजा जसवन्त सिंह द्वारा उन्हें दी गयी उपाधि ‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ को सत्य सिद्ध कर दिखाया। वहीँ शिप्रा के किनारे 22 नवम्बर 1718 को उनका निधन हो गया और इसी के साथ अस्त हो गया राजपूतों की शान बान और बलिदान की परंपरा का एक और सूर्य।

उनकी प्रशंसा में आज भी मारवाड़ में निम्न पंक्तियाँ प्रचलित हैं – माई ऐहड़ौ पूत जण, जेहड़ौ दुर्गादास मार गण्डासे थामियो, बिन थाम्बा आकास।। वीरवर दुर्गादास को शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

साभार___विशाल अग्रवाल