वेद ज्ञान के हीरे मोती, मैं बिखराऊँ सत्संग में।

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सत्संग

वेद ज्ञान के हीरे मोती,
मैं बिखराऊँ सत्संग में।
लूट सके तो लूट ले,
‘प्रेमी’ आज सुनाऊँ सत्संग में।।

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर जो,
ओ३म् का ध्यान लगाता है,
सभी नित्य-कर्मों को करके,
भ्रमण को भी जाता है।
आयु लंबी स्वाध्याय भी अच्छा,
भेद बताऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती…….

यम-नियमों का पालन करके,
जीवन शुद्ध बनाता है,
कर सेवा उपकार सदा जो,
जग में नाम कमाता है।
मिले सदा सुख-शांति उसको,
यह बतलाऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती …………

राग-द्वेष, छल-कपट जो छोड़े,
वही मानव बन जाता है।
इसके विपरीत जो चलेगा,
वह राक्षस कहलाता है।
ईश्वर का उपदेश यही है,
ये समझाऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती …….

कर पुरुषार्थ और सच्चाई से,
जो कमाई खाता है,
इससे आत्मिक-शांति पाकर,
जीवन सफल बनाता है।
पापों से वो बचकर रहता,
ये जतलाऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती ………

आज का मानव, दानव बनकर
सबको दुःख पहुँचाता है,
जो बीज दुःखों का बोता है,
वो कभी नहीं सुख पाता है।
ऐसों को अभिशाप लगेगा,
कहकर जाऊँ सत्संग में ।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती ………

कभी किसी को दुःख ना देना,
विष का मत संचार करो,
वेदों का उपदेश यही है,
हर एक से तुम प्यार करो।
विश्व निवासी सारे अपने,
गले लगाऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती ……….

विश्व का प्रेमी कहे सभी को,
विश्व का तुम उपकार करो,
ऋषियों का आदेश यही है,
वेदों का प्रचार करो।
होगा भला इसी से सबका
यह समझाऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती………

आज दुःखी घर-घर में देखो।
सुख की नींद ना सोते,
चिन्ता घोर निराशा छाई,
वे तो हरदम रोते।
बोया जैसा वैसा पाया,
यह कहकर जाऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती …………

परहित में अपना हित समझो,
ऋषियों ने समझाया है,
जीवन का कल्याण इसी में,
वेदों ने बतलाया है।
भूले को सन्मार्ग दिखा दो,
ये बतलाऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती………

पंच महायज्ञों का करना,
ये कर्त्तव्य हमारा है,
भव सागर से तर जाने का,
प्रेमी यही सहारा है।
स्वर्ग का स्वामी बन जाएगा,
सच बतलाऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती…………

जिसने वेद ज्ञान के हीरे पाये,
जीवन सफल हुआ,
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को पाकर,
जग में ऊँचा नाम किया।
जैसा करो वैसा फल मिलता,
कहकर जाऊँ सत्संग में।।
वेद ज्ञान के हीरे मोती ………