अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते स भ्रातरो वावृधुः सोभगाय ।
युवा पिता स्वपा रुद्र एषां सुदुधा पृश्निः सुदिना मरुद्भ्यः
॥ ऋ. ५.६०/५
तर्जः भगवान ने अपने जैसा हर इक इन्सान
ना बड़ा ना कोई छोटा सबमें आत्मा समाई।
इक माता-पिता के पुत्रों में ये ऊँच-नीच क्यों आई?॥
॥ना बड़ा ॥
संसार के इस आँगन में क्यों फैलाते हो अन्धेरा ?
क्यों जाति पाति की आड़ में करते हो तेरा मेरा,
प्रभु ने जो ज्योति जलाई मानव क्यों तूने बुझाई॥
॥ना बड़ा ॥
काले गोरे क्या हब्शी क्या धनिक सेवक या श्रमीजन
क्षत्रिय अछूत क्या ब्राह्मण भारती और क्या अमरीकन
बुद्ध जैनों मुसलमाँ हिन्दू हैं इसाई परस्पर भाई॥
॥ना बड़ा ॥
सब मरुत देव इस जग के मिलकर कल्याण प्रसारें।
जिससे उन्नत हों मानव, ना घृणा द्वेष को धारें
बन्दूकों तोप गैसों की ना छेड़ें कभी लड़ाई॥
॥ना बड़ा ॥
कल्याण-कर्म करने वाला प्रभु पिता हमारे संग है
हम अमर पिता की सन्ताने क्यों हृदय हमारा तंग
है आ जाओ भेद भुलाकर कल्याण की करें अगुआई॥
॥ना बड़ा॥
ये प्रकृति हमारी सुमाता सुखदायक है दुःख त्राता
ऐश्वर्य दुग्ध की सेविका है, समदर्शी हितैषिता माता
हर पुत्र का है वो आँचल, हम क्यों फिर करें अधमाई॥
॥ना बड़ा ॥
कोई देश भेष का हो मानव इक दूजे का हित चाहें
इस धरा पे बने ना दानव, ये ऊँच-नीच को मिटायें
उद्देश्य में शोभे मानवता जिसमें हो सबकी भलाई॥
॥ना बड़ा ॥
(मरुतदेव) देवता मनुष्य। (अगुआई) पथ प्रदर्शन का काम। (अबमाई) दुष्टता, नीचपन।
(सुमाता) उत्तम माँ। (हितैषिता) कल्याण चाहने वाली।










