सक्तुमिव तित॑उना पुनन्तो॒ यत्र धीरा॒ मन॑सा॒ वाच॒मव॑त ।
अत्रा सखायः सुख्यानिं जानते भ॒द्रेष लक्ष्मीर्निहिताधि॑ि वा॒चि।॥ ऋ. १०.७१.२
तर्जः मी बाळ असा जाग शिकारी
ये धीर पुरुष बोलते सच्ची वाणी (2)
बोले ज्यों सुधी-सुजानी॥
॥ये धीर पुरुष॥
जैसे सत्तू साफ करे हम छान के,
मन वैसे रखें साध के,
कल्याणकारी निकलें शब्द वाक् से
शोभित रहें अन्तर्भाव से
जैसे सत्तु साफ करना कठिन है
वाणी की भी शुचिता कठिन है,
पर धैर्यशाली प्रज्ञामय करें,
यत्न, बनें ज्योतिर्मय
निर्मल निर्दोष निरामय
ये व्यक्त वाणी उनकी बने शक्तिशाली (2)
॥ ये धीर पुरुष ॥
ये धीर पुरुष वाक्-सखा हो जाते
शंसित शक्ति को पाते
शाब्दिक हृदयों में प्रेम-प्रसित हो जाते
बने शब्द अर्थ के सहचर
नित सम्बन्धों का, सदृश पाते अनुभव
तेजों का होता उद्भव
वाणी के प्रकटित शब्द
अर्थापत्ति में हैं समर्थ
पाते ऐच्छिक ऐश्वर्य
बसती, वाणी में लक्ष्मी-कल्याणी॥
॥ ये धीर पुरुष॥
(सुबी) विद्वान, समझदार। (सुजानी) अच्छा जानने वाले। (वाक्) वाणी। (अन्तर्भाव)
अन्तर्गत होना । (शुचिता) पवित्रता। (प्रज्ञामय) बुद्धिमय, मेधामय । (निरामय) निष्कपट,
कुशल । (व्यक्त) प्रकटित। (शंसित) स्तुत्य अभिलिषित इच्छित। (प्रेम-प्रसित) प्रेम पाने के प्रबल
इच्छुक। (सहचर) साथ चलने वाले, सखा। (सदृश) साक्षात्, सामने। (उद्भव) उत्पत्ति।
(अर्थापत्ति) मीमांसा के अनुसार वह प्रमाण जिसमें प्रगट रूप में किसी विषय को प्रकाशित
ना करके केवल शब्द द्वारा ही विषय की सिद्धि होती है वह। (ऐच्छिक) इच्छानुसार मनोनीत ।










