उत्तम गुण मुझमें आएँ

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य॒ज्ञस्य॒ चक्षु प्रभृतिर्मुखं च वाचा श्रोत्रेण मन॑सा जुहोमि ।

इ॒मं य॒ज्ञं विर्ततं वि॒श्वक॑र्मणा दे॒वा य॑न्तु सुमनुस्यमानाः। अथर्व. २.३५.५

तर्जः मळविल इन नरगिन्दे मुखमुन्नु काणा

हे देवों! जीवन के यज्ञों में आओ।
होकर प्रसन्नचित्त मुझमें समाओ।
हे देवों! सद्गुण सद्भाव सद्धर्म
जाग्रत जीवन ज्योतियाँ जगाओ।
विभु विश्वकर्मा का विस्तृत किया यज्ञ
कर्मों की पावकता से पूर्ण हो
कर्मों की संयमता और त्यागमयता से
शत वर्षों तक दिव्य यज्ञ कराओ॥
॥हे देवों ॥

मेरे जीवन यज्ञ का भरण पोषण
करने वाली मेरी दर्शन-शक्ति
पाती रहे सत्य ज्ञान की शिक्षा
जीवन में पाती रहे उन्नति ॥
॥हे देवों ॥

जब मानसिक व शारीरिक शक्ति के
मन इन्द्रियाँ देह तुम ही हो देव
तुम ही तो हो मुझको याज्ञिक बना कर
मार्ग दिखाते हो सात्विक श्रेय ॥
॥हे देवों ॥

सब ज्ञान इन्द्रियाँ और कर्म इन्द्रियाँ
आपस में मिल जुलकर करती हैं यज्ञ
ईश्वर की साक्षी में ईशार्पित बुद्धि से
बनती हैं श्रेष्ठ पवित्र और प्रज्ञ ॥
॥हे देवों ॥

ऐ मन मनस्विन्! निज बुद्धि बल से
चिन्तन मनन करके हो जा याज्ञिक
निदिध्यासन से विभु विश्वकर्मा की
दिव्य शक्तियों से हो जा प्रभावित ॥
॥हे देवों॥

(मनस्विन) उच्च विचार वाला। (विभु) सर्वव्यापक परमात्मा। (विश्वकर्मा) ब्रह्मा, सम्पूर्ण
संसार रचने वाला। (श्रेय) यश तथा कल्याण देने वाला। (सात्विक) वह भाव
जिसमे अधिक सतोगुण हो। (प्रज्ञ) ज्ञानी, जानकार।