उसकी सब प्रशंसा करते हैं

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वि॒श्पति॑ य॒ह्वमति॑थि॒ नर्ः सदा॑ य॒न्तारं धीनामु॒शिज॑ च वा॒धता॑म् ।

अध्व॒राणां चेत॑नं जातवेदसं॒ प्र भ॑सन्ति नम॑सा जूतिभिर्वृध ॥৪॥ साम. १७२०

तर्जः प्रिया आज माझी नसे साथ धाया

चलो मिलके हितकर्ता के गीत गायें।
वो हैं ‘वैश्वानर’ जो उन्नत कराये ॥
॥ चलो ॥

वो है जातवेदा, वो सर्वन्तर्यामी (2)
वो सर्वज्ञ है सबका एकमात्र स्वामी (2)
श्रद्धा प्रणति के भाव मन में जगायें
॥चलो ॥

स्तुतिगान के संग क्रिया भी आवश्यक (2)
धरें हाथ पर हाथ तो जीवन अकारथ (2)
गतिशीलता का सङ्कल्प बनायें
॥चलो ॥

जो विश्वापति है प्रजाओं का स्वामी (2)
अधीश्वर है वो ही जगत का विधानी (2)
भक्तों को सन्मार्ग पे विधिवत चलाये
॥चलो ॥

दिशा, बुद्धि कर्म की, जिनकी सही है (2)
तो अवरोध जीवन में उनके नहीं है (2)
जगत में वो मानवता शान्ति फैलाये
॥चलो ॥

जो मानव सेवायज्ञ का बने ऋत्विज (2)
अहिंसा के भाव जगे जिसके सात्विक (2)
हिंसा और प्रभु-प्रीत मेल ना खायें
॥चलो ॥

है आपसे प्रेम, प्रभु-प्रेम-द्योतक (2)
ये सब प्रेमी पहुँचेंगे प्रभु-प्रेम-लौ तक (2)
इन्हीं सद्गुणों से विभूषित हो जायें।
॥चलो ॥

(वैश्वानर) सब नरों को आगे ले जाने वाला। (जातवेदा) उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान
और जानने हारा। (सर्वज्ञ) सब कुछ जानने वाला। (अकारथ) व्यर्थ । (विधानी) प्रवन्ध
करने वाला, व्यवस्थापक, व्यवस्था करने वाला। (ऋत्विक) नेता। (योतक) बतलाने वाला,
प्रकाशक। (विभूषित) अलंकृत। (ली) दीपक बाती से उठती आग। (अवरोध) रुकावट ।
(विधिवत) ठीक प्रकार से।