शतधारमुत्समक्षीयमाणं विपश्वितं पितरं वाक्तानाम् ।
मेळिं मदन्तं पित्रोरुपस्थे तं रोदसी पिपृतं सत्यवाचम्।।
ऋ. ३.२६.६
तर्जः पिक्क दिक्कन वोरु काटिने, राग पीलू
तू है गुरुओं का गुरु
प्रभु ध्यान तेरा करूँ
सत्य उपदेश तेरे
मन-आत्मा में भरुँ
ज्ञान वेदों का अक्षय
देता तू महिमामय
और बोध सृष्टि का
करता है तू शुरु ॥ तू है गुरुओं का॥
पूर्ण ज्ञान देके भी, तू पूर्ण ही रहता
स्त्रोत शतधारी अक्षीयमाण वेद कहता
उच्चतम गुरुओं का उच्चतम अधिपति
कालातीत महागुरु सर्वोपरि
अद्भुत आनन्द,ज्योति निरन्तर
पाते रहे देवगरू ॥तू है गुरुओं का॥
प्रभु को तो पाना है, जगाओ आत्मशक्ति
ढूँढ लो हृदय में उसको और पाओ मुक्ति
आँखों से ना देखा जाए, वो तो है सर्वव्यापी ।
कण कण में दिखाये जादूगरी
ध्यान निरन्तर है गुरुमन्तर
पाओ हृदय में प्रभु॥
प्रभु को तो पाना है, जगाओ आत्मशक्ति
ढूँढ लो हृदय में उसको और पाओ मुक्ति
आँखों से ना देखा जाए, वो तो है सर्वव्यापी ।
कण कण में दिखाये जादूगरी
ध्यान निरन्तर है गुरुमन्तर
पाओ हृदय में प्रभु॥
(बोध) ज्ञान, (अक्षय) जिसका विनाश न हो, (अक्षीयमाण) कभी क्षीण या निर्बल न होने
वाला। (शतवारी) सैंकड़ों धाराओं वाला। (कालातीत) सब कालों से घिरे । (सर्वोपरि) सबसे
उत्तम। (गरू) प्रतिष्ठित










